बुलंद तस्वीर
बुलंद तस्वीर
उसके नसीब में कूड़ा
बीनना ही लिखा है
अल सुबह बच्चें जब अपना बैग
थामे विदा होते हैं
स्कूल के लिए
तब वो भी अर्ध नग्न देह
खाली पैर
अपने कंधो पर टांगता है भाग्य
का बोझा
और निकल पड़ता है
ख़्वाब बटोरने ...
कूड़ों की ढ़ेंर पर
ढूंढता है भूख
जिंदगी की तलाश
क्या होती है उसे नहीं मालूम ...
उसके दोस्त उसका
करते है सहयोग
बीच - बीच में भू - भू कर
उसे जतला देते हैं
कि दोस्त घबराना मत
मैं भी यही हूँ
भले सरकार ना सुने
तुम्हारी आवाज़
लेकिन मैं सुनूंगा क्यों कि
वफा शब्द सिर्फ हमें ही
पहचानती है...
दुत्कारें हुए हम दोनों ही हैं
इस आज़ाद देश का
वह सबसे अंतिम प्राणी है
जिसे ये भी नहीं मालुम
की पंद्रह अगस्त क्यों मनाते हैं
देश के प्रधानमंत्री कौन है
और क्यों फहरातें हैं झंडा...
आज के दिन वो कूड़ें की
ढ़ेर से निकल मुठ्ठी में
बाँधता है झण्डें और
कुछ गुब्बारें भी और दौड़ पड़ता है
हँसते हुए लंबी गाड़ियों के पीछे
अपनी आज़ादी बेचने
साक्षरता अभियान उसके नाम
अभी दर्ज नहीं हुई है...
आसमान छू रहे पतंग भी
हवा में क्यों लहराते हैं
उसे नही मालूम
उसे तो बस टूटते धागों
को पकड़ने में ही मज़ा है
आज़ादी के तीन रंग
रोटी , कपड़ा, आवास
के लिए कुलबुलाते रहना
यही है हमारें
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर।
