बसंत में विकल हुई गोरिया
बसंत में विकल हुई गोरिया
रास रंग प्रीत ले बसंत ऋतू है आई,
भंवरा गुनगुनाए कलियाँ मुस्कुराई !
आई बसंत औ महमहाई अमरैइया,
पीरी चुनरी ओढ़कर नाचे गुजरिया !
प्रीति के रंग में रंग रंग गई गोरिया,
ढूंढ रही है इत उत अपना सांवरिया !
पिया मिलन की आस लिए हिया,
बेकल होकर चल चली सजनियां !
बागों में कुहू कुहू कूके कोयलिया,
झूला झुलाये रही सारी सहेलियाँ !
अब के बसंत कुछ बदल देगी दुनिया,
कल की कुंवारी बननेवाली है दुल्हनियाँ !

