बंद किताबें
बंद किताबें
सदियां बीत गई
यह एक कड़वी सच्चाई है कि
किताबें तो पड़ी है बंद एक
बंद अलमारी में ही
एक लंबे अरसे से
न अलमारियां खुली हैं और
न ही उनमें पड़ी
धूल में सनी हुई
किताबें
कुछ बरस पहले तक
किताबों की यह हालत न थी
उन्हें हाथों में पकड़ा जाता था
खोला जाता था
पढ़ा जाता था
उसमें जो कुछ लिखा होता था
उसे समझा जाता था
उसे अपने जीवन में
प्रयोग में भी लाया जाता था
सोशल मीडिया पर पड़ी
पोस्ट ही आजकल तो
अधिकतर लोग पढ़ते हैं
किताबों को अब कौन
खरीदता है और
कौन कहां पढ़ता है
घर में एक कोने में पड़ी
किताबों को पढ़ना तो
दूर की बात है
एक सूती कपड़ा लेकर
उस पर पड़ी धूल की परतों को
हटाने की भी कोई
जहमत नहीं उठाता
किताबों को
घर के पुराने सामान को
इस दुनिया से विदा हो चुके
लोगों को
गुजरे हुए सुनहरे लम्हों को
उनकी यादों को
महान शख्सियतों को
अपने देश के इतिहास को
जिंदा को
मुर्दे को
सब कूड़ा हैं
कहने को कोई कुछ भी
कहता रहे पर
यह एक नीम के पत्ते सा ही
कड़वा सच है कि
कोई किसी को
एक कौड़ी के लिए भी नहीं
पूछ रहा
इस तरह के बेअदबी के
माहौल में
भला इन किताबों की तरफ
कौन देखेगा और
कौन बीड़ा उठायेगा
इनकी देखभाल का
ऐसे ही किसी रोज
इनके पन्ने गल जायेंगे
फट जायेंगे
इन्हें दीमक चाट जायेगी
रद्दी की टोकरी में ही
बिकने के लिये
यह घर से बाहर
एक मुर्दा लाश की तरह ही
रवाना कर दी जायेंगी
इनकी शव यात्रा में
कोई शामिल नहीं होगा
क्योंकि इन किताबों को
जो पीढ़ी कभी पढ़ती थी
वह तो इनसे पहले ही
कभी की मर चुकी।
