बंद दरवाज़ा
बंद दरवाज़ा
मूंदकर नयन अध जागे से
सुस्ताने लगी तो
पलकों पर मधम रोशनी
कुछ हल्की सी तपन देने लगी
रह गया है कुछ अधूरा सा बाकी
रोशनी बताने लगी
कोशिश कर अनुमान सहेजने लगी
नींद को शयन से उठाकर
माथे पर लकीरें खींच
धीमी स्वास में सुनने लगी
एक स्वर...जो काफी वजन उठाए था
सन्नाटा चाहूं ओर लिपटाए था
जिसकी गिरफ्त में विचारों की टिक- टिक
खामोश धड़कन को पहुंच रही थी
और "मैं " सब होते हुए भी
अधूरापन महसूस कर रही थी
चाहत थी कि कोई आवाज़ तो दे
हल्के से ही सही मगर
हाथों को स्पर्श देकर कोई अपना तो कहे
और कहे की " मैं हूं ना"
इसी आवाज़ को तरसती हसरतें
गुम हैं मेरी अध जागी सुप्त अवस्था में कहीं
बेचैन और ओहदे मुंह पड़ी हैं दहलीज पर कहीं
अधूरेपन से दूर आज़ाद होने के लिए।
