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Reena Goyal

Abstract

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Reena Goyal

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भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार

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 रह- रह कर ये मेरे मन में ,उठता रहा सवाल ।

भ्रष्ट आचरण बन बीमारी ,जग में करे बवाल ।।


      


रिश्वत खोरी कहीं ,कहीं पर ,महँगाई की मार ।

नैतिकता भी आज बिकी है ,देखो बीच बजार ।

धनिक अधिक अब धनी हो गए ,निर्धन अति कंगाल ।।

भ्रष्ट आचरण बन बीमारी ,जग में करे बवाल ।।


    


शिक्षा ट्यूशन लेकर मिलती ,व्यर्थ हुए स्कूल ।

शिक्षा को पैसों में तोलें ,करते क्यों ये भूल ।

निर्धन शिक्षा से वंचित है ,दिल मे यही मलाल ।।

भ्रष्ट आचरण बन बीमारी ,जग में करे बवाल ।।


   


बड़े-बड़े गड्ढ़े सड़कों पर ,भृष्ट हुए सब काम ।

नेता खाते पैसा सारा ,फिर भी मिले इनाम ।

मुश्किल में आवाम हुई है ,जीना हुआ मुहाल ।।

भ्रष्ट आचरण बन बीमारी ,जग में करे बवाल ।।


नेताओं के घोटालों का ,खूब हो रहा शोर ।

बड़े शान से लूट रहे हैं ,नही किसी का ज़ोर ।

ऊँचे पद आसीन सभी हैं ,ये भी बड़ा कमाल ।।

भ्रष्ट आचरण बन बीमारी ,जग में करे बवाल ।।


 


काले धन से भरी तिजोरी ,लेकिन भरे न पेट ।

सस्ती चीजें महँगी बेचें ,लगा चौगुना रेट ।

धरती माँ का सौदा करके ,बनते मालामाल ।।

भ्रष्ट आचरण बन बीमारी ,जग में करे बवाल


लगे सभ्य सरकारी बाबू ,हैं अवाम के साथ ।

लेकिन टेबल के नीचे से ,माँगे भर भर हाथ ।

रिश्वत खोरी इन बाबू की ,जी का है जंजाल ।।


भ्रष्ट आचरण बन बीमारी ,जग में करे बवाल ।। 


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