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Sonam Kewat

Tragedy Classics Thriller

4  

Sonam Kewat

Tragedy Classics Thriller

भीड़ और सूनापन

भीड़ और सूनापन

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भीड़ बहुत बाहर बहुत है पर 

दिल में खाली सा एहसास है 

कोई बहुत दूर है पर फिर भी 

इस दिल के बहुत ही पास है 


समझ नहीं आता कि आखिर

मुझे भीड़ में गुम होना है या 

इस भीड़ से लड़ झगड़कर

किसी और का होना है 


आंख खुलते ही अक्सर 

इस शोर में गुम हो जाती हूं 

रात होते हैं बस यूं समझो 

सुनेपन को पाकर सो जाती हूं 


अब तो मुझे ये सूनापन भी

बड़ा ही अच्छा लगता है 

भीड़ की दुनिया में देखा है 

वहां कोई नहीं सच्चा लगता है 


ये भीड़ साथ तो रहती है पर 

कभी भी साथ देती नहीं है 

बहुत कोशिश की दूर करने की

लेकिन सूनापन अब भी यहीं हैं।


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