भेद
भेद
कुछ राज़ ही होगा
कोई कैसे इतना बदल सकता है ?
रंग लहू का क्या काला बन सकता है ?
कोई भेद ही होगा,
जो छुपा हुआ था हर किसी से ।
क्या इतना खूबसूरत नकाब भी है हो सकता ?
कोई पुरानी रंजिश ही होगी,
या इस जन्म की या फिर उससे पहले की ।
क्या अपने ही खून से सींचे पौधे को है कोई काट सकता ?
कोई अजीब से नाराजगी होगी,
जिसकी कोई न जान न पहचान ।
क्या बेवजह आपने ही देह को है छेद सकता ?
अगर कुछ है नहीं,
तो ये हो रहा क्या है ?
गिरगिट भी शर्मा जाए,
क्या इतना रंग बदल सकता है कोई ?
