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Vikas Sharma Daksh

Romance

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Vikas Sharma Daksh

Romance

बहाने

बहाने

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तन्हाई में भी महफ़िल आबाद रहती है

साथ हमारे अब आपकी याद रहती है


ऐसा नहीं कि अब रहता मायूस नहीं

तबियत मगर पहले से शाद रहती है


सुलग रहा है मेरा जिगर धुआँ धुआँ

आह भी अब बन के फ़रियाद रहती है


पर्दादारी यूँ ही मुनासिब नहीं मुहब्बत में

राज़ को भी तवज़्ज़ो की मुराद रहती है


इश्क़ सबर बख़ूबी सीखा देता है साहब

वरना तो इंतज़ार की भी मियाद रहती है


मुझे ख़बर वो मसरूफ़ क्यों है इस क़दर

ना मिलने के बहाने करती इज़ाद रहती है


'दक्ष' इश्क़ में हौसलों से इमदाद रहती है

आशिक की ज़िद भी मुबारकबाद रहती है



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