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Zuhair Abbas

Tragedy


5.0  

Zuhair Abbas

Tragedy


बेवफा मोहब्बत

बेवफा मोहब्बत

1 min 223 1 min 223

 मेरे लफ्जों की हक़ीक़त जो समझते तुम शायाद फिर ठहरते तुम

इतनी फुर्सत कहां थी तुम्हें मेरा हाल जो कभी बैठकर पूछते तुम।


अब तो बस सवाल है अफसोस है कुछ उमीद की रौशनी है

ना पछताते तुम ना पछताते हम गर जो लफ्ज़ों पर एतबार करते तुम।


अब एक खला है ज़िन्दगी में ख़ामोशी है सब धुआं धुआं सा है

आज भी ये समां हसीन होता हम होते एतबार होता मोहब्बत होती ,

यूं जो बे वाजाह रूठकर हमसे दूर ना होते तुम।


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