STORYMIRROR

Nazim Ali (Eʁʁoʁ)

Tragedy

3  

Nazim Ali (Eʁʁoʁ)

Tragedy

बेशर्म

बेशर्म

1 min
340

बहुत शर्मिंदा हो जाता हूँ

जब अख़बार पढ़ता हूँ ।


के पहली ही खबर में

जब बलात्कार पढ़ता हूँ।


के अब तो हर सुबह मैं 

खुद पे भी धिक्कार करता हूँ 


बहुत शर्मिंदा हो जाता हूँ

जब अख़बार पढ़ता हूँ ।


हर एक बस्ती में जैसे 

अब तो ये मामूल लगता है 


जाने कब से इन लाशों 

को बार बार पढ़ता हूँ 


बहुत शर्मिंदा हो जाता हूँ 

जब अख़बार पढ़ता हूँ !


न जाने कितनी ही जाने

गयी और कितनी जाएंगी


हवस की जीत और कानून

की जब हार पढ़ता हूँ।


बहुत शर्मिंदा हो जाता हूँ

जब अख़बार पढ़ता हूँ।"



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy