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Sri Sri Mishra

Children

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Sri Sri Mishra

Children

बचपन की साइकिल..

बचपन की साइकिल..

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आज बरसों बँद पड़े ..कमरे को जब खोला

बैठी साइकिल पर धूल की ....सात परतों ने मुंह खोला

याद आ गए सुनहरे बचपन के वो दिन

उसकी छोटी लाल गद्दी से खूब चढ़ते-उतरते थे..

ट्रिन -ट्रिन की मनमोहक आवाज से सबको खूब लुभाते थे

उसके आते ही घर में बनी थी उस दिन खीर

मेरे उदास मन कि वह जैसे उड़ा ले गई थी हर पीर

रोज सवेरे उठकर सवारी उसकी करते थे

खेल खेल में चढ़कर गिरते और संभलते थे


कभी पैडल मारकर उसको खूब चलाते थे

कभी बैठकर पीछे दोनों हाथों में आसमां लेकर खुश हो जाते थे

गिर कर उठना... उठकर संभलना... फलसफा ये

जिंदगी का खूबसूरत ...सिखा गई साइकिल ये..

वो सुहाने बचपन के ..खूबसूरत पल याद दिला कर

खिलखिला कर दिल को गुदगुदा गई ये

चला था आज उसको कबाड़ में बेचने

उतरी जो चेन उसकी .... फिर उसी चाव से लगा उसे चढ़ाने

साफ कर उसको ..फिर लगा उसे मैं चमकाने

बदल गया मन मेरा... सजाने का फिर लगा तलाशने घर के कोने

जी लूंगा बचपन को अपने.. देख कर उसको इसी बहाने..



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