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Sulakshana Mishra

Abstract

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Sulakshana Mishra

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औरत

औरत

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अँधेरो से डरने की

उसकी फितरत ही नहीं।

वो जाबांज़ है कुदरती

बुज़दिली उसकी

कुदरत में नहीं।


लाख सच हो

उसकी ज़ुबान पे।

पर तौला जाता 

तराजुओं में अक्सर,

उसका ईमान है।


आँखों में आँसू भरकर भी

जाने कैसे वो मुस्कुरा जाती है।

हैरत है मुझे कि

वो दिल में अपने

कितने राज़ हैं गहरे

जिनको आसानी से

छुपा जाती है।


कभी बन के सीता

अग्निपरीक्षा से गुज़र जाती है।

कभी द्रौपदी बन

चीर हरण भी सह जाती है।


सब सह कर भी

ये औरत ही है ज़नाब

जो बनाती है

एक आदमी को

आदमी से इंसान।


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