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संजय असवाल "नूतन"

Abstract

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संजय असवाल "नूतन"

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औरत और संघर्ष.....!

औरत और संघर्ष.....!

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औरत सिर्फ औरत होती है 

निसहाय,कमजोर 

चाहे उच्च वर्ग से हो या 

निम्न वर्ग से 

उसे झेलना होता है 

हर जगह 

निरंतर चलने वाला दमन 

सहना होता है 


उत्पीड़न,

असहनीय पीड़ा,

बहिष्कार और 

पग पग में मिलने वाला मानसिक 

शारीरिक शोषण।

बचपन से ही 

उसे सिखाया जाता है 

नजरे नीची करना,

कम बोलना, 

खुद में ठहराव लाना, 

मां का हाथ बटाना, 

छोटे भाई बहनों को संभलना।


भले वो स्वयं 

संभलना सीख रही हो पर 

उसे कच्ची उम्र में ही 

समय से पहले 

परिपक्व बना दिया जाता है,

बता दिया जाता है 

कि तुम्हारा जन्म ही 

दूसरों की सेवा के लिए हुआ है, 


तुम्हें बस जीना है 

दूसरों की इच्छा के 

अनुरूप दबकर।


उनकी खुद कोई पहचान नहीं 

वो जीती है 

सदैव दूसरों की 

छत्र छाया में 

एक परछाई बनकर, 

जिसका कोई अस्तित्व नहीं 

जो मिटता है 

बनता है 

दूसरों के रहमों करम पर।


उसे बस मिलता है 

उतना ही आसमान 

जिसमे वो अपने रंगीन 

सतरंगी सपने संजोह सके, 

थोड़ी सांस भर सके।


उसका दायरा 

बहुत सिमटा होता है, 

पैर पसारने के लिए 

उसे जो थोड़ी आजादी मिलती है 

उसका आकार बेहद छोटा और 

संकीर्ण होता है, 

मगर जीवन की जद्दोजहद 

बहुत लंबी 

उसके संघर्षों के सदृश।


उसे लड़ना होता है 

हर स्तर पर 

अंदर और बाहर 

दोनो जगह 

खुद से भी और 

अपने आसपास की वर्जनाओं से,

अपनों से और

अजनबियों से भी

स्वयं निहत्था 

बिलकुल अकेले...!


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