STORYMIRROR

संजय असवाल "नूतन"

Abstract Fantasy Others

4.5  

संजय असवाल "नूतन"

Abstract Fantasy Others

अब मैं खुद से दूर हो रहा हूं।

अब मैं खुद से दूर हो रहा हूं।

1 min
17

अब मैं खुद से दूर हो रहा हूं 

सारे दुखों से आज़ाद हो रहा हूं,

जो बांधते थे मुझे हर रिश्ते में कभी

उन सवालों से मैं दूर हो रहा हूं।


क्यों मैं अब किसी से दिल लगाऊं

जब उसके अधूरे वादों से निकल रहा हूं,

जिसे समझा मैंने उम्र भर अपना

उसी की याद में रुखसत हो रहा हूं।


मैंने अपने ही सपनों को रुलाया है

उन्हें कांटों की सेज पर सुला रहा हूं,

हंसते चेहरे की ओट में मैं अब

अपने आंसुओं को भी छुपा रहा हूं।


ना अब शोर चाहिए मुझे

ना तालियों की भूख में जी रहा हूं,

भीड़ में रहकर वर्षों से मैं 

अपनी आत्मा संग अकेले रह रहा हूं।


मैं इस दुनियां से दूर नहीं जा रहा

बस खुद के भीतर लौट रहा हूं,

जो खो गया था दूसरों में कहीं

उसे चुपचाप अब समेट रहा हूं।


ये पलायन नहीं,ये विराम है बस

टूटन के बाद खुद को जोड़ रहा हूं,

आज खुद से फिर मैं मिलने चला हूं 

शायद जिंदगी का असली मुकाम ढूंढ रहा हूं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract