माघ मेला..
माघ मेला..
माघ की ठंडी भोर में
आस्था दीप जलाए,
संगम तट पर उमड़े जन
मन विकार मिटाए।
गंगा,यमुना की धारा में
जहां सरस्वती का हो नाद,
आत्मा को छू जाती है
सच्ची श्रद्धा और विश्वास।
नंगे पाँव चले जब श्रद्धालु
आँखों में जगे विश्वास,
तप, त्याग और संयम से,
मिल जाता है उन्हें प्रकाश।
कुंभ की इसी परंपरा में
छिपा जीवन का सार,
अहंकार का त्याग करो
बनो प्रेम का आधार।
यह मेला केवल भीड़ नहीं
आत्ममंथन का है क्षण,
टूटे हौसलों को जहां मिलता
एक प्रभावी नया स्पंदन।
माघ मेला सिखलाए हमको
सादा जीवन का मंत्र,
सेवा, करुणा, सत्य में ही
छिपा है सुख दुःख का तंत्र।
