और खिल आया गुलाब
और खिल आया गुलाब
कलपती बेल
कितनी बार तड़फी-गिरी
खुद ही उठ कर
खुद पर ही
पलटी, रिरियाई
रोई बुक्का फाड़
पर कौन पौंछता आंसू
कौन बंधाता धीरज
जली, मरी फिर-फिर
अनगिन बार
पर न जाने क्या था भीतर
जो हरिया देता हर बार
राख हुआ चाहती आस को।
आज फिर अश्रु-धार
अविरल
लाचारगी, बेबसी, विरह के
कितने बादल आतुर
उसे अपने में समेट लेने को,
वह भी थकी-हारी निढाल
अब खुद को कर दे शायद।
नियति के हवाले
मुंद- मुंद जाती आंखों में
अचानक जल उठा दीप
उम्मीद का
वह उठ बैठी फिर से।
दालान के गमले में उगे गुलाब में
फिर कोई कली चटकी
और खिल आया गुलाब
बंजर धरती पर
फिर से मूसलाधार।
