STORYMIRROR

Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

2  

Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

अपनों का धोखा

अपनों का धोखा

1 min
43

जिसको यहाँ अपना मानते वही धोखा देता है

जिसकी भलाई सोचा करते वही दगा देता है

विश्वास शब्द से तो आज विश्वास उठ गया है,

जिसे अक्स मानते वही आईना तोड़ देता है

रोटी खाकर बेचारा कुत्ता तो पूछ हिलाता है,

इंसां जिस थाली में खाता उसीमें छेद कर देता है



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy