अन्यथा चलूँ
अन्यथा चलूँ
घनी घनी सी बात हो
गहराई से गहरी रात हो
ऐसी मुलाकात हो तो, रूकूं
अन्यथा चलूँ.
खोखली, ओछी बात पर
तन से तन की रात पर
क्यों व्यर्थ जाया करूं
बेकरारी के सौदे में क्यों क्षणिक करार भरूं
कुछ यूं मिलना हो, बेचैनी उम्र भर हो
न कोई वादा न इरादा, बाजार के चलन से दूर
मैं तुम हो जाऊँ
कुछ ऐसी बात हो तो रूकूं
न निकल सकें, मिले तो फिर एक दूजे के बिना न चल सकें
पर्वत सी अचल प्रीति हो
तुम भी राधा, मैं भी राधा
ऐसा एकत्व हो तो इस महा रास में पग धरूं
अन्यथा चलूँ.

