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VanyA V@idehi

Tragedy

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VanyA V@idehi

Tragedy

अंतस की व्यथा

अंतस की व्यथा

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कोई बंजर धरती भी फिर से उपजाऊ हो सकती है,

सूने नगरों में भी बस्ती की गुंजाइश हो सकती है !

पर जो मन उजड़ गया फिर से नहीं खिल पाता है,

बहारों का मौसम तो फिर भी आता और जाता है !


जीवन के विष का प्याला क्षण-क्षण कैसे पीते हैं,

मनोव्यथा की गहराई की आजमाइश हो सकती है !

वैसे तो दुनिया में सब कुछ को मापा जा सकता है ,

पर मन के खालीपन में कितना झाँका जा सकता है।


दायित्वों के दर्पण में इस जीवन का विस्तार लिए,

कर्तव्यों की औषधि से खालीपन का उपचार किए !

पूछो न कैसे वह अपनी दीर्घ पीड़ा को झुठलाता है,

प्रतिपल मन का खालीपन बस बढ़ता ही जाता है !



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