अंतस की व्यथा
अंतस की व्यथा
कोई बंजर धरती भी फिर से उपजाऊ हो सकती है,
सूने नगरों में भी बस्ती की गुंजाइश हो सकती है !
पर जो मन उजड़ गया फिर से नहीं खिल पाता है,
बहारों का मौसम तो फिर भी आता और जाता है !
जीवन के विष का प्याला क्षण-क्षण कैसे पीते हैं,
मनोव्यथा की गहराई की आजमाइश हो सकती है !
वैसे तो दुनिया में सब कुछ को मापा जा सकता है ,
पर मन के खालीपन में कितना झाँका जा सकता है।
दायित्वों के दर्पण में इस जीवन का विस्तार लिए,
कर्तव्यों की औषधि से खालीपन का उपचार किए !
पूछो न कैसे वह अपनी दीर्घ पीड़ा को झुठलाता है,
प्रतिपल मन का खालीपन बस बढ़ता ही जाता है !
