शहर
शहर
शहरों की भीड़ में तो तमाशे बहुत दिखे।
कुछ लोग मुझको करते दिखावे बहुत दिखे।।
हमदर्द बन के आते हैं, देते हैं दर्द वो।
मुझको गिराने वाले सहारे बहुत दिखे।।
नाकाम कोशिशें हैं व टूटे हुये हैं ख़्वाब।
कुछ लोग के तो पस्त इरादे बहुत दिखे।।
आँसू किसी की आज कोई पोंछता नहीं।
नाकाम लोग मुझको अकेले बहुत दिखे।।
बस दूसरों को ज्ञान दिया करते हैं सभी।
भटके हुए भी राह दिखाते बहुत दिखे।।
उस दिलरुबा से आँख मेरी लड़ गई थी जब।
नयनों में उसके ख़्वाब सुहाने बहुत दिखे।।
नज़रों के तीर से वो कलेजे को चीर दी।
अंदाज़ उसके मुझको निराले बहुत दिखे।।
कुछ लोग ज़िंदगी को किए हल्का इस तरह।
हसरत को अपनी आग लगाते बहुत दिखे।।
जालिम को देख अब वो ख़ामोश हो गये।
लाचार को मगर वो सताते बहुत दिखे।।
