STORYMIRROR

Vipin Saklani

Crime Thriller

4  

Vipin Saklani

Crime Thriller

अनजाना भय

अनजाना भय

1 min
10

छिपे खतरों से है आशंकित मन,

होता अति भय का आभास निरंतर,

गुमशुदगी बहुत हो रही इर्द गिर्द,

हरपल बेचैन मन कर रहा रुदन ।


सुरक्षित जिन्दगी लुप्त सी हो गई,

बेखौफ भ्रमण पर लग रहा ग्रहण,

नित्य राह चलते गुमशुदा होते नौनिहाल ,

अपहरणकर्ता सा लगे संदिग्ध राहगीर।


कभी बेटी , तो बेटे होते कभी गुम,

आते–जाते राह से हो जाते वे लोप ,

अब डर भी नहीं किसी नगर कोतवाल का,

गुंडे मवाली बैखोफ घूमते भरी दोपहर ।


मानव अंग की तस्करी में शामिल कुछ लोग,

अंग खरीद–फरोख्त का बढ़ रहा है बाजार ,

नही मिलते कोई आसानी से अंगदानी यहां,

शायद बच्चे इसलिए गुम होते चहुंओर।


हो घर का चिराग , या सयानी बिटिया कोई ,

खतरे की आहट को शीघ्र ही पहचान ना पाए तो,

सोचिए क्या मंजर होगा जब टुकड़ों में मिले कहीं,

संवेदनाएं दम तोड़ रही, अब ना जाने क्यों ...? 



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Crime