इतवार का सच
इतवार का सच
हफ्ते भर की थकन ओढ़े,
मन हर पल व्याकुल-सा रहे,
आया जब भी इतवार द्वार,
कुछ पल को ही सुकून मिले।
अलसुबह से संध्या तक,
इंसान मशीन-सा हो जाता,
रोज़ी-रोटी की दौड़ में,
अपनों से रिश्ता खो जाता।
दिल में सबके आस लगी,
कब मिल बैठेंगे दो घड़ी,
छः दिन बस चलते रहो,
इतवार होगी मौज बड़ी।
पर अब इतवार भी रूठा-सा,
अधूरे काम गिनाने लगा,
सुकून उस दिन भी न ठहरा,
फरमाइशों में दौड़ाने लगा।
न चैन रहा अब इतवार में,
काम उसी दिन बढ़ जाता,
हर पल, हर दिन कुछ न कुछ,
छुट्टी का नाम बदनाम हो जाता।
पर उम्मीद अब भी बाकी है,
हर अंधियारे की भोर कहीं,
दो पल अपने, मुस्कान सच्ची,
जीवन की असली दौलत वही।
काम नहीं है सब कुछ ही,
रिश्तों से ही अर्थ मिले,
थोड़ा ठहरें, थोड़ा जियें,
तब हर दिन ही इतवार बने।
विपिन सकलानी
