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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत-६९; ध्रुव वंश का वर्णन, राजा अंग का चरित्र

श्रीमद्भागवत-६९; ध्रुव वंश का वर्णन, राजा अंग का चरित्र

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सूतजी बोले शौनक जी से कि

ये सब सुनकर मैत्रेय जी से

विदुर के ह्रदय में भक्ति का उदय हुआ

मैत्रेय जी से वो फिर प्रश्न करें।


पूछें मुने, ये प्रचेता कौन थे

और वो किसके पुत्र थे

उन्होंने कहां पर यज्ञ किया था

और किसके वंश में प्रसिद्ध थे।


जब प्रचेता यज्ञ कर रहे

ध्रुव का गुणगान किया नारद जी ने

भगवान लीलाओं का वर्णन किया

वो सब आप मुझे अब कहें।


मैत्रेय जी कहें कि हे विदुर जी

सब छोड़ जब ध्रुव चले गए

वैभव और राजसिंहासन उनका

अस्वीकार किया पुत्र उत्कल ने।


समदर्शी वो, शांत चित था

देखे सभी को अपनी आत्मा में

और अपनी आत्मा को वो

स्थित देखे सम्पूर्ण लोकों में।


अज्ञानिओं को ऐसा प्रतीत हो

जैसे वो कोई पागल मूर्ख था

पर वो सब उनका भ्रम था

वास्तव में वो ऐसा नहीं था।


मूर्ख और पागल समझकर

मंत्रिओं और कुल के बड़ों ने उसको

राज्य दे दिया भ्रमि पुत्र

उसके छोटे भाई वत्सर को।


वत्सर की भार्या स्वरवीथी ने

जन्म दिया था छ:पुत्रों को

पुष्पाराण, तिगमकेतु, दोष, ऊर्जा

वसु और जय नाम के थे वो।


पुष्पारण की दो स्त्रियां थीं

प्रभा और दोष उनके नाम थे

प्रभा के प्रात:, मध्यन्दिन और सांय

इन नामों के तीन पुत्र हुए।


दोष के परदोष, निषध और व्युष्ट

इन नामों के तीन पुत्र थे

व्युष्ट के सर्वतेजा का जन्म हुआ

पुष्करणी नाम की भार्या से।


सर्वतेजा की पत्नी आकूति से

चक्षुः नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ

चाक्षुक नाम के मन्वन्तर में

यही चक्षुः था जो मनु हुआ।


चक्षुः मनु की स्त्री नड्वला से

बारह बालक उत्पन्न हुए थे

पुरु, कुत्स, क्रित, द्युमन, सत्यवान, ऋत, व्रत

अग्निष्टोम, प्रद्युमन, शिवि और उल्मुक नाम के।


उल्मुक की पत्नी पुष्करणी से

छ: उत्तम पुत्र उत्पन्न हुए

अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु

अंगिरा और गय उनको नाम दिये।


अंग की पत्नी सुनीथा से

क्रूर वेन उत्पन्न हुए थे

जिसकी दुष्टता से दुखी होकर 

छोड़ नगर को अंग गए थे।


मुनियों ने कुपित हो वेन को 

श्राप दिया और वो मर गया 

राजा न होने पर लुटेरों से 

प्रजा को था कष्ट होने लगा। 


ये देख मुनियों ने वेन की 

दाहिनी भुजा का मंथन किया था 

जिससे भगवन विष्णु के अंश 

पृथु का अवतार हुआ था। 


विदुर जी पूछें हे ब्राह्मण 

बड़े साधु स्वाभाव थे अंग तो 

महात्मा थे वो तो फिर कैसे 

वेन जैसा पुत्र हुआ उनको। 


वेन ने क्या अपराध किया था 

जो श्राप दिया उसको मुनियों ने 

सुनीथा पुत्र वेन की कथा 

विस्तारपूर्वक मुझे सुनाइये। 


मैत्रेय जी कहें कि हे विदुर जी 

एक बार राजर्षि अंग ने 

अनुष्ठान किया अशव्मेघ यज्ञ का 

आग्रह करने पर ब्राह्मणों के। 


ब्राह्मणों के आह्वान करने पर भी 

अपना भाग न लें देवता 

तब ऋत्विजों ने विस्मित होकर 

यजमान अंग से ये था कहा। 


हे राजन, हम आहुतिओं के रूप में 

घृत अदि पदार्थ हैं डाल रहे 

हम जो हवन हैं कर रहे 

देवता उसे स्वीकर न करें। 


ऐसी कोई बात दिखे न 

कि तिरस्कार हुआ देवताओं का 

पर पता नहीं फिर भी क्यों 

कोई अपना भाग न लेता। 


ऋत्विजों की बात को सुनकर 

राजा अंग उदास बहुत हुए 

मुझसे कोई अपराध हुआ क्या 

पूछा उन्होंने वहां सदस्यों से। 


सदस्यों ने कहा, हे राजन आपसे 

न अपराध हुआ इस जन्म में 

एक अपराध जिससे पुत्रहीन आप 

हुआ था आपसे पूर्व जन्म में। 


इसलिए आप उपाय कीजिये 

पुत्र प्राप्ति के लिए पहले 

अगर यज्ञ करो इस कामना से 

भगवान पुत्र प्रदान करेंगे। 


संतान के लिए यज्ञपुरुष का 

आह्वान किया जायेगा जब 

अपना अपना भाग ग्रहण करें 

देवता लोग स्वयं ही तब। 


ऋत्विजों ने यज्ञ पशु को 

पुरोडाश नमक चरु समर्पण किये 

अग्नि में आहुति डालते ही 

उसमें से एक पुरुष प्रकट हुए। 


उनके हाथ में स्वर्ण पात्र था 

सिद्ध खीर लिए थे जिसमें 

खीर अपनी पत्नी को दी थी 

राजा अंग ने लेकर अंजलि में। 


यथा समय उनके पुत्र हुआ 

 नाना मृत्यु का अनुयायी वो था 

जो अधर्म के वंश में उत्पन्न थे 

वह भी इसीलिए अधार्मिक हुआ। 


दुष्ट बालक वो, वन में जाकर 

मारे, भोले भाले हरिणों को 

क्रूर और निर्दई इतना कि 

मार डाले छोटे बालकों को। 


राजा अंग ने बहुत कोशिश की 

किसी तरह से सुधर जाये वो 

परन्तु सुमार्ग पर न ला सके 

उनको कष्ट हुआ, दुखी हुए वो। 


मन ही मन कहने लगे कि 

जिससे सुयश मिटे माता पिता का 

ऐसी नाम मात्र की संतान को 

कौन पुरुष लेना चाहेगा। 


सोचें ये एक मोह बंधन है 

रात को सो न सके वो सोचते 

चित गृहस्थी से विरक्त हो गया 

चल दिए वो राजमहल से। 


सभी लोग शोकातुर होकर 

उन्हें ढूंढ़ने लगे नगर में 

मिले न तो मुनियों को बताया 

महाराज, मिल न पाए उन्हें। 



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