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Vipin Saklani

Classics

4.5  

Vipin Saklani

Classics

साहित्य (एक कटाक्ष)

साहित्य (एक कटाक्ष)

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 क्या है साहित्य?
कोई ऐप है क्या?
जिसे डाउनलोड करते ही
ज्ञान की नोटिफ़िकेशन आने लगें?

साहित्य कहते किसे हैं?
140 अक्षरों में समा जाए
तो ही मान्य है क्या?
या इमोजी जोड़ दो
तो अर्थ अपने-आप निकल आता है?
किस हेतु होता है साहित्य?
 मन को माँजने के लिए?
 या फिर रिज़्यूमे की
आख़िरी पंक्ति भरने के लिए?
इसके दृश्य–अदृश्य परिणाम
अब दिखते नहीं साहब,
क्योंकि देखने की फुर्सत किसके पास है?
ये प्रश्न कई दिनों से नहीं,
कई सालों से मन में चिल्ला रहे हैं—
पर आज की पीढ़ी हेडफ़ोन लगाए
 उन्हें सुन ही नहीं पा रही।
लिखना? अरे छोड़िए! आज तो
 संदेश भी ऑटो-करेक्ट लिखता है।

आवेदन पत्र में “Respected Sir”
अब भी सुरक्षित है,
बस आगे का सब कॉपी–पेस्ट है।
कविता, रचना,
गद्य या पद्य—
ये शब्द अब सिलेबस की कब्र में
दफ़्न हो चुके हैं।
 शब्द गढ़ना? वाक्य-विन्यास?
बहुत पुरानी बीमारी है।
 जनाब! भावनाएँ अब लिपिबद्ध नहीं होतीं,
 स्टेटस पर टपकती हैं।
दिल दुखा? एक sad emoji।
खुशी मिली? चार fire और दो heart।
और पूछते हैं— क्या आज की पीढ़ी
साहित्य के रंग-ढंग में
अपना परिचय दे सकती है?
दे सकती है, बस नाम के आगे
 “Bio” लिखना आता है।

मोबाइल ने भाषा को गोद में नहीं लिया,
उसे गोदाम में डाल दिया है।
शॉर्टकट इतना बढ़ गया है कि
भाषा अब अपाहिज सी लगती है।
साहित्य? वो तो रास्ते में ही छूट गया।
अब न भाव व्यक्त होते हैं, न विचार।
 न बोलने में दम है, न लिखने में।
समृद्ध साहित्य का शुभचिंतक ढूँढो
तो वह भी ऑनलाइन
ऑफ़लाइन रहता है।

 तोड़-मरोड़ कर बोलना
अब स्टाइल कहलाता है।
हिंदी विलुप्त नहीं हो रही,
उसे जानबूझकर
हाशिये पर धकेला जा रहा है।
साहित्य के चिंतक?
 हाँ हैं— गिनती के, और चुप।
अख़बार? वो तो अब
कबाड़ी की शोभा बढ़ाते हैं।

फोन पर बतियाना हुआ,
तो चिट्ठी-पत्री इतिहास की
प्रदर्शनी बन गई।
पंचतंत्र, नंदन, चंपक,
सुमन-सौरभ— अब बच्चों की नहीं,
संग्रहालयों की वस्तुएँ हैं।

कौन पढ़े, कौन लिखे,
और कौन समय गँवाए ,
इन बेमुनाफ़ा शब्दों पर?
शब्दों के बाज़ीगर अब भी हैं,
 पर मंच नहीं।
और जो मंच पर हैं,
उन्हें शब्दों की ज़रूरत नहीं।

साहित्य-प्रेमी उपेक्षित हैं,
और हिंदी साहित्य के दुश्मन मंचासीन।
गले में माला, हाथ में मोबाइल,
और मुँह में हिंग्रेज़ी।
हिंदी के उत्थान पर भाषण देते हैं,
और भाषा की हत्या करते हैं।

 *— विपिन सकलानी*


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