Ravidutt Mohta
Tragedy
औरत
सारी उम्र
पहने रहती है
एक उँगली में
पूरी शादी
उसकी कलाइयाँ
भर दी जाती है
चूड़ियों से
नारी देह का
कोई अंग नहीं छोड़ा
पुरुष ने
अपनी हवस मिटाने को
यहां तक कोख भी
उसकी
पुरुष भर देता है
अपनी हवस से
बेचारी औरत
सारी उम्र रह जाती है
तरसती
एक पुरुष को।
ठोकर
कुछ नहीं होता
मैं संन्यास ल...
मैं सचमुच कुछ...
कत्ल से भरी य...
होंठ मेरे कित...
अंगूठी
हिचकी
वे दो बांहें
आत्मा
आजकल प्रेम की गाड़ी शिद्दत की पटरी से उतर गई है। आजकल प्रेम की गाड़ी शिद्दत की पटरी से उतर गई है।
मेरे पास कोई अधिकार नहीं है जिनसे मैं तुम्हे मांग सकूं ।। मेरे पास कोई अधिकार नहीं है जिनसे मैं तुम्हे मांग सकूं ।।
मां की कोख से ही रही खोजती पहिचान कैसे एक मां तोड़ती दूजी का स्वाभिमान। मां की कोख से ही रही खोजती पहिचान कैसे एक मां तोड़ती दूजी का स्वाभिमान।
क्या नहीं हुआ मेरे साथ, बचपन से मेरी बेरोजगारी तक, कब और कितना तुमने दिया है। क्या नहीं हुआ मेरे साथ, बचपन से मेरी बेरोजगारी तक, कब और कितना तुमने दिया ...
कभी नफरत को नफरत से काटा जा सकता है क्या ? कभी नफरत को नफरत से काटा जा सकता है क्या ?
आप सभी को सच्ची बात बताता हूँ, किरदारों की पहचान छुपा बताता हूँ। आप सभी को सच्ची बात बताता हूँ, किरदारों की पहचान छुपा बताता हूँ।
अकेला ही पाती हूँ खुद को, जब-जब अंतरंग साथी की जरूरत महसूस होती है। अकेला ही पाती हूँ खुद को, जब-जब अंतरंग साथी की जरूरत महसूस होती है।
प्यार कर बैठी थी मैं था प्यार कच्ची उम्र का दिलों में अब भी बसा प्यार कच्ची उम्र का। प्यार कर बैठी थी मैं था प्यार कच्ची उम्र का दिलों में अब भी बसा प्यार कच्ची उ...
प्यार स्नेह की मिलनी थी छत्रछाया वहां बोझ ढोना सिखा दिया, प्यार स्नेह की मिलनी थी छत्रछाया वहां बोझ ढोना सिखा दिया,
तुम्हारी खामोशी अब चुभने लगी है, दरों दीवारों से टकराकर। तुम्हारी खामोशी अब चुभने लगी है, दरों दीवारों से टकराकर।
रोज का वार्तालाप कभी लिखे शब्दों से कभी बोले लफ्जो से। रोज का वार्तालाप कभी लिखे शब्दों से कभी बोले लफ्जो से।
राजनीति की इस भारत में रही हमेशा यही कहानी। राजनीति की इस भारत में रही हमेशा यही कहानी।
कभी पहले होता था समन्दर जो अब नहीं है! कभी पहले होता था समन्दर जो अब नहीं है!
आसान अगर शहर-ए- मोहब्बत का पता होता। आसान अगर शहर-ए- मोहब्बत का पता होता।
तू अबला! है दीन-दुखी यह दुनिया स्वार्थ की भूखी। तू अबला! है दीन-दुखी यह दुनिया स्वार्थ की भूखी।
माँ मैं क्या लिखूं.... बेटो को घर मिला हिस्से में ये लिखूं। माँ मैं क्या लिखूं.... बेटो को घर मिला हिस्से में ये लिखूं।
क्यों सुधबुध हार गई वो प्यार में, इम्तेहान भी उसने ही दिया हर बार क्यों। क्यों सुधबुध हार गई वो प्यार में, इम्तेहान भी उसने ही दिया हर बार क्यों।
कहना था तुमसे कुछ पर दिल में ही दिल की बात रह गई। कहना था तुमसे कुछ पर दिल में ही दिल की बात रह गई।
बस उसी पल ये मन मेरा विचलित होने लगता है। बस उसी पल ये मन मेरा विचलित होने लगता है।
चंद खुशियों की हसरत में बेपनाह दर्द बाकी है। चंद खुशियों की हसरत में बेपनाह दर्द बाकी है।