आज भी कहीं बाकी है
आज भी कहीं बाकी है
उस अधूरे चाँद सी एक अधूरी कसक,
आज भी कहीं बाकी है
तुझसे दिल-ए-आरजू कहने की ठसक,
आज भी कहीं बाकी है।
सिसकता रहता हूँ रात भर तेरी ही यादों में
पर तुझसे मिलने पर नज़रें चुराने की वो आदत,
आज भी कहीं बाकी है।
चाहता हूँ कर ही दूँ इकरार-ए-मोहब्बत एक दिन
पर तेरे इनकार का वो डर,
आज भी कहीं बाकी है।
वो जो शरारती सी लट, लटकती है तेरी आँखों के पास
उसे अपने हाथों से, सँवारने की वो आरज़ू,
आज भी कहीं बाकी है।
तेरे चेहरे से हटना गंवारा नहीं इन्हें
पर इन बेईमान आँखों में थोड़ी शराफत,
आज भी कहीं बाकी है।
जानता हूँ की ये मुमकिन नहीं, फिर भी
इस दिल में तेरी हाँ सुनने की वो चाहत,
आज भी कहीं बाकी है।

