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Vikas Sharma Daksh

Romance

4  

Vikas Sharma Daksh

Romance

आदत

आदत

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इक आदत सा निभा गया वो,

जब हँसा, तो याद आ गया वो।


वक़्त करता रहा तब्दील हमें,

ज़ात वही पुरानी दिखा गया वो।


जब भी टूट कर बिखरने लगा,

गले मिल सीने से लगा गया वो।


फासले भी ना आ सके दरम्यां,

दिल को छू मुझे हिला गया वो।


छेड़ कर ज़िक़्रे-रवानी-ए-वक़्त,

जाने क्यों फिर यूँ रुला गया वो।


कमज़ोर हौसलों से घबराया था,

पेशानी चूम, सर सहला गया वो।


मुहब्बतें भी अजीब रही हमारी,

'दक्ष' को सुख़नवर बना गया वो।


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