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खूनी दरिंदा  भाग 9
खूनी दरिंदा भाग 9
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© Mahesh Dube

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रविकांत का मोबाइल घनघना कर बंद हो गया, उसने अपना मोबाइल देखा तो उसपर सिल्विया का मिस कॉल था। उसने फोन लगाने की कोशिश की तो कॉल लगा ही नहीं। उसने घबराकर कई बार कोशिश की पर कोई जवाब न मिलने पर वह तेजी से सिल्विया के घर की ओर चल पड़ा। उसके और सिल्विया के घर के बीच एक शॉर्टकट रास्ता था, जो कई बंगलों के आगे-पीछे से घूमता हुआ गुजरता था और मुख्य सड़क से हटकर था। पर यह रास्ता उजाड़ और झाड़-झंखाड़ से भरा हुआ था। रास्ते में अँधेरा था। ऊपर से चांदनी का प्रकाश था जो बहुत कम था। रविकांत ने अपने मोबाइल की टॉर्च जला ली और उसके प्रकाश में रास्ता ढूंढता चलने लगा। बीच में खन्ना का बंगला आया तो रवि ने चहारदीवारी से उचक कर भीतर का जायजा लिया भीतर सन्नाटा था। रवि आगे चल पड़ा। उसका हृदय उसकी चाल से भी तेज चल रहा था। पता नहीं क्यों उसे किसी अनहोनी की आशंका सता रही थी।

सिल्विया के घर के बाहर पहुंचकर रवि बदहवास सा हो गया क्योंकि उसे दरवाजा टूटा हुआ दिखाई पड़ा। उसने झपट कर दरवाजा खोला और सिल्विया को पुकारता हुआ भीतर दाखिल हुआ, उसने पूरा घर छान मारा पर सिल्विया कहीं नहीं मिली। वातावरण में मौत का सन्नाटा था। रविकांत ने फौरन सुरक्षा अधिकारी थापा को फोन करके घटना की सूचना दी और बंगले के बाहर निकल आया। उसने मन में तय कर लिया कि थापा के आते ही वह उनसे खन्ना के बारे में अपने सारे संदेह प्रकट कर देगा फिर नतीजा चाहे जो हो। बाहर निकल कर रविकांत जोर-जोर से सिल्विया को पुकारता हुआ ढूंढने लगा। इधर-उधर की झाड़ियों में ढूंढता हुआ अचानक वह एक झुरमुट में पहुंचा तो ऐसे ठिठक कर रुक गया मानो बिजली का झटका लगा हो। सामने टूटी हुई गुड़िया की तरह छिन्न-भिन्न अवस्था में सिल्विया का शव पड़ा हुआ था। उसकी गर्दन मुड़कर ऐसी अस्वाभाविक अवस्था में पहुँच चुकी थी कि उसके जीवित होने की कोई संभावना नहीं थी। उसकी एक टांग शरीर से अलग थी मानो उखाड़ ली गई हो और उसका काफी भाग खाया भी जा चुका था। उसे ऐसा भयानक दृश्य देखकर चक्कर से आने लगे। उसने जबरन वहां से निगाह हटाई और एक डाली का सहारा लेकर झूलने सा लगा। फिर वह झटके से मुड़ा और सिल्विया के मकान की ओर बढ़ा जहां जल्दी ही थापा का आगमन अपेक्षित था, पर चार छह कदम चलते ही उसे मानो दस हजार वॉट का झटका लगा। सामने खन्ना एक पेड़ का सहारा लेकर खड़े थे और खूनी निगाहों से रवि को घूर रहे थे। उनकी निगाहों में मौत की ठंडक थी। रवि का हृदय मानो उछलकर उसके हलक में आ फंसा। उसके हाथ-पाँव कांपने लगे और वह लड़खड़ा कर गिर पड़ा। खन्ना सधी हुई चाल चलते उसके सर पर आन खड़े हुए। उन्होंने एक हाथ से उसकी गर्दन थामी और उठा कर खड़ा कर दिया। खन्ना उस समय एक विकराल राक्षस लग रहे थे। उनके दांतों पर सिल्विया का ताजा रक्त लगा हुआ था। उन्होंने अट्टहास करते हुए रविकांत को भूमि पर पटक दिया। रविकांत गिरते ही तड़पकर एक दिशा की ओर भागा पर खन्ना की तेजी के आगे कहाँ जाता? खन्ना ने बिजली की तेजी से उसका रास्ता काट दिया और  दोनों हाथों से उसे ऊँचा उठा कर फिर भूमि पर पटक दिया। हड्डी टूटने की आवाज आई और रविकांत बहुत जोर से चीख पड़ा। खन्ना अपने पैने नाखूनों वाले हाथ आगे किये उसपर झपटे और इसके पहले कि वे रविकांत का गला उधेड़ देते एक फायर हुआ और एक गोली खन्ना की छाती में पैबस्त हो गई। खन्ना जिबह किये जा रहे पशु की तरह चिचिया उठे पर दूसरे की क्षण वे फायर की दिशा में लपके कि गोलियों की बौछार ने उन्हें पूरी तरह बींध कर रख दिया। उनका शरीर कटे पेड़ की तरह धराशायी हो गया, फिर झाड़ियों की ओट से थापा अपने रिवाल्वर को फूंक मारते प्रकट हुए और उनके पीछे चार सैनिक ए के सैंतालीस लिए बाहर आ गए। उन्होंने लगभग मृत हो चुके रविकांत को उठाया और फौरन अस्पताल ले गए फिर खन्ना और सिल्विया के शव भी पोस्टमार्टम हेतु भेज दिए गए।

बाद में पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर का तब हार्टफेल होते-होते बचा जब उसने देखा कि खन्ना का खून हरे रंग का हो चुका था और उनके शरीर में कई बदलाव हो गए थे जो उन्हें एक सुपर या अर्ध मानव के स्तर पर ले आये थे। बाद में रविकांत स्वस्थ हो गया और उसने अपने अनुभव भी बताये तो सभी को पता चला कि राजनिवास खन्ना ही खूनी दरिंदे थे। रविकांत की विनती पर उस प्रयोगशाला को बंद कर दिया गया और सरकार ने अपना महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट वापस ले लिया। सभी वैज्ञानिकों को दूसरे स्थानों पर भेज दिया गया। वह किलेनुमा स्थान वीरान हो गया। पर आज भी कभी-कभी रविकांत सिल्विया की कब्र पर फूल रखने और मोमबत्ती जलाने आया करता है जिसके बारे में उसका मानना है कि वो उसकी वजह से ही मारी गई थी।

   समाप्त।

 

 

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