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रमनदीप

रमनदीप

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दो दिन चेन्नई बाढ़ की विभीषिका देख चुकने के बाद मैं सुबह एयरपोर्ट पहुंचा तो बरसात रुक चुकी थी और हल्की धूप खिल आई थी। रास्ते में तबाही के निशान कयामत की गवाही दे रहे थे पर एयरपोर्ट लगभग सामान्य ही लगा। अतिरिक्त सावधानी हेतु काफी जल्दी ही चला आया था और अकेला मैं ही ऐसा नहीं था। प्रतीक्षा लाउंज में मिली मोगा पंजाब की रमनदीप। पक्के रंग की छोटे कद और दुबले बदन की चेन्नई से बी.टेक की पढ़ाई कर रही लड़की आज अपने घर जा रही थी।" अंकल ज़रा बैग पकड़ाना" से शुरू हुई बातचीत काफी लंबी चली। दोनों ही वक्त के मारे थे और समय काटने के आकांक्षी! रमन की बड़ी-बड़ी आँखों में पल रहे सपने, उसकी इच्छायें, उसके सपने सब धीरे-धीरे खुलते रहे। उसने  मेरे और मेरे परिवार के बारे में सब कुछ पूछा और अपना बताया। बाढ़ में लड़कियों के हॉस्टल में क्या-क्या हुआ वो सब वर्णन करती रही। लगभग दो घण्टे मैं उसकी बातों के प्रवाह में डूबता उतराता रहा। रमन के रूप में मैं युवा शक्ति के जोश और स्पष्ट नज़रिये को महसूस कर रहा था। पढ़ाई की वजह से वह इच्छा होते हुए भी अधिक घूम नहीं पाती और अभी तक वह मुम्बई भी नहीं देख पाई है कह कर इतनी ज़ोर से हंसी मानो भारी मज़ाक की बात हो। उसकी उन्मुक्तता मुझे अच्छी लगी। मैंने कहा लड़कियां शादी के बाद घूमती हैं तो वह थोड़ा बुझ सी गई। उसने विषय बदल दिया। यही वह नुक्ता है जो रमन दीपों को नर्वस कर देता है। एक अपरिचित घर और माहौल की सोच ही इनके सपनों को सिहरा देती है। किसी की किस्मत अच्छी हुई तो वहाँ भी पंख मिल जाते हैं अन्यथा खेल ख़त्म। जूझो चूल्हे चौके में!
             बात-बात में हंसती खिलखिलाती, आँखें चौड़ी करके विस्मय प्रकट करती, छोटी-सी रमन दीप कई बार मेरी चुटकी भी लेती रही। मेरी फ्लाइट का गेट नंबर तय न होने से वह अपनी एयरलाइन को बेहतर और मेरी एयरलाइन को कबाड़ बताकर हंसती रही। मैं उसकी हंसी पर सौ-सौ जान से कुर्बान होता सोचता रहा कि बेटियां कितनी अच्छी होती हैं। काश! एक मेरी भी होती। अचानक उसकी बोर्डिंग शुरू हुई तो बाय-बाय अंकल करके रमनदीप चली गई। मैं भी चल दिया कुछ दूर जाकर मुड़कर देखा तो रमनदीप वहां से भी हँसते हुए हाथ हिला रही थी फिर रमनदीप चली गई और मैं सोचने लगा ये चिड़ियों जैसी फुदकती चहकती रमनदीपें आखिर एक दिन कहाँ चली जाती हैं?


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