दिल अपना और प्रीत पराई...
दिल अपना और प्रीत पराई...
कहीं दूर एक गांव में,
शाम का समय, सूरज डूबने जा रहा है, सूरज की हल्की रोशनी से आकाश का रंग गहरे नारंगी रंग का हो गया है, पक्षियों के झुंड भी दिन भर टहलकर अपने अपन आशियाने की ओर लौट रहे हैं, एक नहर के किनारे, गन्ने के खेत से खुसर-पुसर की आवाजें आ रही हैं। थोड़ी देर और रूको ना सुलक्षणा, अभी तो आई थी, प्रकाश बोला, अच्छा, थोड़ी देर, पता है, तीन बजे की घंटी बजी थी, दीवार घड़ी में तब की निकली हूं, घर से! जरा अपनी कलाई में बंधी, घड़ी तो देखो कितना बजा रही है, सुलक्षणा बोली। प्रकाश ने देखा, घड़ी शाम के छै बजा रही थी, अरे, तीन घंटे से हम यहां बैठे हैं, पता ही नहीं चला, तुम साथ होती हो तो समय का कुछ भी पता नहीं चलता, प्रकाश बोला।
पता है घर पर झूठ बोलकर आई थी, किरन के साथ, खेत जा रही हूं, मुझसे पहले किरन घर पहुंच गई तो बहुत ही आफत होगी, तुम्हारा क्या?
अरे, चली जाना, और रूको थोड़ी देर, ऐसा कहकर प्रकाश ने सुलक्षणा का हाथ पकड़कर, गन्ने के खेत में फिर बैठा लिया।
सुलक्षणा उठी, और ये कहते हुए चली गई कि कल मिलेंगे।
शाम का समय, लोगों के घरों में चूल्हे सुलगने लगे हैं, धुंए की सोंधी सोंधी खुशबू हर तरफ़ से आ रही हैं गांव में शाम को जल्दी खाना बन जाता है, जानवरों के झुंड भी खेतों से चरकर, चरवाहों के साथ वापस लौटने लगे हैं, और जानवरों के गले में बंधी घंटियां मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रही हैं, पनहारियों के झुंड भी सर पर घड़े रखकर, कुंए पर पानी भरने के लिए जा रहे हैं, बहुत ही लुभावना है सब।
उधर एक बहुत पुरानी सी जर्जर हवेली जिसमें दीनानाथ चौधरी अपने परिवार के साथ रहते हैं, बस खोखली शान-शौकत है, कर्ज ले-लेकर जीवन-यापन हो रहा है, इतनी जमीन थी पुरखों की, सब अय्याशी की भेंट चढ़ गई और सब, टुकड़े-टुकड़े कर, घर खर्च के लिए गिरवी रख दी गई, इतने भी पैसे नहीं हैं कि हवेली की मरम्मत भी हो जाए, बस चल रही है गाड़ी, भगवान भरोसे, सब "ढोल में पोल है"।
दीनानाथ जी के छै बच्चे है, चार बेटियां और दो बेटे, तीन बेटियों की शादी हो चुकी है, सबसे बड़ी बेटी करूणा के पैदा होने के दस साल तक दीनानाथ के यहां संतान नहीं हुई, करूणा जो कि फतेह सिंह चौधरी से ब्याही है लेकिन ब्याह को पन्द्रह साल हो चुके हैं, उनके अभी तक संतान नहीं हुई है, करूणा सुंदर थी, फतेह सिंह को किसी विवाह के अवसर पर मिली थी, उसे देखते ही उसकी सादगी और सुंदरता पर मोहित हो गए, और दीनानाथ चौधरी के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा, दीनानाथ चौधरी को भी कोई परेशानी नहीं हुई, बिना दहेज के बेटी जो ब्याह रहीं थीं, बस हो गई शादी, और दो छोटी बहनों के ब्याह करूणा ने, फतेह सिंह से कहकर अच्छे घरों में करवा दिए।
अब दीनानाथ चौधरी के दो छोटे बेटे और एक बेटी बची है जिसका नाम सुलक्षणा है, वो गांव के बनिए के बेटे प्रकाश से प्रेम करती है, उससे छुप-छुपकर रोज खेतों में मिलने जाती है, वो भी सुलक्षणा से प्रेम करता है।
तभी सुलक्षणा ने घर में कदम रखा, उसे देखते ही उसकी मां सियादुलारी चिल्ला पड़ी, कहां थी अब तक, खाना बनाने का समय हो गया है और तेरा कुछ पता नहीं कहां घूमती रहती है दिन भर, चल जा पहले कुंए से पानी भर ला फिर खाना बना लें।
हां.. हां.. जाती हूं....जाती हूं... चिल्लाना बन्द करो, सारा काम मैं ही तो करती हूं, कौन सा यहां नौकर-चाकर लगे हैं, खोखली हवेली के खोखले लोग, बस दिखावा ही दिखावा है, सुलक्षणा पैर पटकते हुए वहां से चली गई।
सुलक्षणा और प्रकाश ऐसे ही निरंतर मिलना जारी रहा, फिर एक दिन प्रकाश ने सुलक्षणा से कहा कि मुझे बाबूजी व्यापार के सिलसिले में शहर भेज रहे हैं, मैं कहां रहूंगा अभी मेरे पास कोई पता ठिकाना भी नहीं है। सुलक्षणा ने तड़पकर पूछा, कितने दिन के लिए?
बस, एक महीने की बात है पगली, व्यापार जैसे ही वहां व्यवस्थित हो जाएगा, थोड़ा मुनाफा होने लगेगा तो बाबूजी से तुम्हारी और मेरी शादी की बात करने की हिम्मत आ जाएगी, निठल्ले बेटे की कौन बाप शादी करना चाहेगा और तुम्हारे मां बाप भी तो निठल्ला दामाद नहीं चाहेंगे।
ये सुनकर सुलक्षणा चहक उठी और प्रकाश के गले लग गई, फिर दो तीन दिन बाद प्रकाश चला गया।
डेढ़ महीने हो गए, ना तो प्रकाश आया और ना उसकी खबर, फिर एक दिन, किरन घर आई सुलक्षणा की सबसे अच्छी सहेली, उसने बताया कि उसका बड़ा भाई शहर गया था, उसे प्रकाश मिला था, उसने वहां पिता के कहने पर किसी व्यापारी की लड़की से शादी कर ली है और वहीं उसके घर में घर -जमाई बनकर रहने लगा है और तू है कि यहां उसके प्यार में पागल हुई जा रहीं हैं, धोखा दिया है उसने तुझे, अभी समय है सम्भल जा, उसने तेरा फायदा उठाया है, इतना कहकर वो चली गई।
तभी करूणा ने संदेशा भेजा कि बड़ी ननद की बेटी का ब्याह है, सब लोग आएंगे तो अच्छा रहेगा, काम में कुछ मदद हो जाएगी, लेकिन दीनानाथ चौधरी अपनी पत्नी सियादुलारी से बोले, अगर वहां जायेंगे तो कुछ ना कुछ कन्या को देना होगा, और सबके लिए नये कपड़े भी चाहिए, और फिर बड़ी बेटी का घर है खाली हाथ कैसे जायेंगे, ना हमारे पास रूपए ना पैसे, तुम ऐसा करो, सुलक्षणा बस को कुछ नये कपड़े दिलवाकर भिजवा दो, कहलवा देना कि मेरी तबीयत खराब है, मेरी देखभाल के लिए तुम रूक रही हो तो हम नहीं आ सकते, सिया दुलारी ने ऐसा ही किया दोनों बहन-भाई चले गए शादी में।
पूरी शादी भर सुलक्षणा परेशान रही लेकिन करूणा के पूछने पर कुछ नहीं बताया, शादी आराम से निपट गई, दुल्हन विदा हो गई, सारे मेहमान भी एक दो दिन में चले गए, करुणा ने भाई को जाने दिया लेकिन सुलक्षणा को रोक लिया, हवेली में अब चार लोग ही बचे थे , फतेह सिंह, करूणा, सुलक्षणा और करूणा की बड़ी ननद जानकी जीजी।
जानकी जीजी की भी बहुत दुःख भरी कहानी, चौदह साल की उम्र में शादी हो गई, सोलह की होते-होते एक बेटी की मां बन गई, पति की पारिवारिक दुश्मनी में, पति को किसी ने गोली मारी दी, और वो बच्ची को बचाते मायके पहुंच गई, तब से वहीं है, बेटी की भी जिम्मेदारी निपट गई, वो भी पराये घर की हो गई, फतेह सिंह और करूणा जीजी की बहुत इज्जत और सम्मान करते, मां की तरह मानते हैं।
तभी एक दिन सुलक्षणा को उल्टियां होने लगी, करूणा ने पूछा तो उसने कहा कि वो मां बनने वाली हैं और उस लड़के ने किसी और से शादी कर ली है।
जीजी और करूणा ने धीरे से दाईं मां को बुलाया और दाईं ने सुलक्षणा की नब्ज देखी और बता दिया अभी दो महीने पूरे नहीं हुए हैं कोई दवा देनी हो तो बताओ, लेकिन करूणा ने बहुत सारे पैसे देकर दाईं का मुंह बंद कर दिया, बोली सुलक्षणा इस बच्चे को जन्म देगी, जीजी बोली, तू पागल हो गई है करूणा! एक बिन ब्याही लड़की कैसे बच्चे को जन्म दे सकती है, समाज क्या कहेगा।
करूणा बोली, ठाकुर साहब करेंगे सुलक्षणा से शादी, अब इस हवेली का वारिस आएगा, मैं मनाऊंगी, ठाकुर साहब को, इस बच्चे के लिए मैं कुछ भी करूंगी।
नहीं ये नहीं हो सकता, किसी और का पाप तू मेरे भाई के सिर पर कैसे लाद सकती है, जीजी बोली।
जीजी मैंने देखा है, उन्हें सन्तान के लिए पल-पल मरते, उनके आंसू बहते नहीं है, अंदर ही अंदर सूख जाते हैं, जिससे उनके दिल में घाव हो गए हैं, पंद्रह साल से वीरान पड़ी उनकी दुनिया में अब बहार आएगी।
करूणा नहीं मानी, उसने सुलक्षणा की स्थिति से सबको अवगत कराया, मां बाप ने तो अपनी इज्जत बचाने के लिए हां कर दी, लेकिन फतेह सिंह ने करूणा से कहा__
करूणा ये कैसे हो सकता है, मैंने कभी भी इस नज़र से उसे नहीं देखा, तुम से वो पन्द्रह साल छोटी है और तुम मुझसे पांच साल छोटी हो, बीस साल का अंतर है, सुलक्षणा और मुझमें।
करूणा बोली, जरा सोचिए ठाकुर साहब हमारे आंगन में भी किलकारियां गूंजेगी, इस घर को सम्भालने वाला कोई आ जाएगा।
फतेह सिंह बोले, करूणा फालतू की ज़िद मत करो, तुम ही मेरी पत्नी हो और तुम ही रहोगी।
करूणा बोली, अच्छा आप ही बताइए, इसके अलावा, और कोई तरीका है आपके पास, सुलक्षणा की इज्जत बचाने का, अगर है तो बताओ।
फतेह सिंह बोले, ये बच्चा रखने की क्या जरूरत है, खत्म करो इसे और सुलक्षणा की शादी किसी और से करवा दो।
तभी जीजी कमरे में आई और बोली, करूणा ठीक कह रही है, बच्चे को मरवाना, ये समस्या का हल नहीं है, उस नन्ही सी जान का क्या कसूर है जो अभी दुनिया में आया ही नहीं है, उसके आने से हम सबकी जिंदगी खुशियों से भर रही है तो उसमें क्या बुराई है?
जीजी के कहने पर फतेह सिंह शादी के लिए तैयार हो गए, साधारण तरीके से थोड़े बहुत मेहमानों के बीच शादी हो गई।
रात को मधु-चन्द्र रात्रि की बेला थी, इसकी खुशी ना तो सुलक्षणा को थी और ना फतेह सिंह को, वो दोनों तो वहीं कर रहे थे जो करूणा कह रही थी।
करूणा ने सुलक्षणा को सजाकर कमरे में बैठा दिया और ठाकुर साहब से बोली, चलिए अंदर।
फतेह सिंह के मना करने पर भी, फतेह सिंह को कमरे में जाना पड़ा, फतेह सिंह जैसे ही पहुंचे_
सुलक्षणा ने चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया, वो बोली...शर्म नहीं आपको शादी के लिए हां करते, मैं लड़की होकर मना नहीं कर पाई, आप तो मना कर सकते थे, अपनी उम्र देखिए, बीस साल बड़े हैं आप मुझसे, लेकिन नहीं जवान लड़की देखी और निकल पड़े शादी करने, मर्दों की जात ही कुछ ऐसी होती हैं, और खबरदार जो मुझे छूने की कोशिश की, घिन आती है मुझे ऐसी घटिया सोच वाले इंसान से, ये लो तकिया और अपना बिस्तर अलग बिछाकर सो जाओ, सुलक्षणा ने तकिया फतेह के चेहरे पर दे मारा।
बेचारा फतेह अपना सा मुंह लेकर बिस्तर बिछा कर करवट बदलकर लेट गया और दुःख से उसकी आंखें लाल हो गई, और आंखों से दो बूंद आंसू भी टपक गये, सुलक्षणा ने ये सब सुना और भगवान के पास जाकर फूट-फूट कर रोने लगी, हे भगवान! ये क्या हो गया मुझसे, इतनी बड़ी गलती हो गई, इतनी बेइज्जती करवा दी उनकी, मैं कैसे उनसे नज़रें मिला पाऊंगी।
दूसरे दिन ना तो करूणा और ना ही फतेह एक-दूसरे से नजरें मिला पा रहे थे लेकिन जैसे ही करूणा ने हिम्मत करके फतेह से कहा जरा सुनिए, कल रात.......
फतेह सिंह बोले, बस इसलिए मैं नहीं चाहता था कि ये शादी हो, वो मुझे इतना गलत समझ रही है, कल रात उसने कितने घटिया इल्जाम लगाये मुझ पर, गुस्से से पागल थी, सही ग़लत में अंतर करना भूल गई है, क्यों कराई तुमने ये शादी?
करूणा गुस्से से सुलक्षणा के पास जाकर बोली_
क्या समझती है, तू खुद को, पाप तूने किया, मुंह तू काला करके आई, और कोई भला आदमी तेरे पाप को समेटने की कोशिश कर रहा, तेरे ऊपर लगे कलंक को मिटा रहा है तो तू उसे खरी-खोटी सुना रही है, ऐसा कोई महान काम नहीं किया है तूने जो हम तेरे नखरे उठाये और खबरदार जो आज के बाद मेरे पति को कुछ कहा तो.....इतना कहकर करूणा चली गई।
अब, सुलक्षणा को थोड़ा एहसास हुआ कि शायद उसने बहुत कुछ ग़लत कह दिया है और कर दिया है, ये लोग तो सिर्फ मेरी मदद कर रहे हैं, मुझे तो इनका धन्यवाद करना चाहिए लेकिन मैंने तो सबका दिल दुखा दिया।
आज सुलक्षणा को प्रसव-पीड़ा हो रही हैं, सबको नये मेहमान के आने का इंतजार है, करूणा इतनी खुश हैं कि, बस यहां से वहां, कुछ ना कुछ इंतज़ाम करने में लगी है और फतेह सिंह भी बस परेशान होकर आंगन में टहल रहे हैं, तभी करूणा कमरे से बाहर आई____
ठाकुर साहब........ ठाकुर साहब....... बेटा हुआ है, हम लोग मां-बाप बन गये, सुलक्षणा और बच्चा दोनों ठीक है, हमारा आंगन अब सूना नहीं रहेगा, यहां भी कोई अपने नन्हे-नन्हे पैरों से चलेगा, वो यहां से वहां भागेगा , सारे घर में छुपता फिरेगा और मैं जशोदा मैया की तरह अपने कन्हैया को ढूंढा करूंगी, आज मैं बहुत खुश हूं ठाकुर साहब, और ये कहते-कहते उसकी आंखें झर-झर बहने लगी।
अरे पगली, अब भी रो रही हो, बधाई हो! मुंह मीठा नहीं कराओगी, फतेह सिंह बोले।
हां, मारे खुशी के तो मैं भूल ही गई, आज तो मैं सारे गांव का मुंह मीठा कराऊंगी,
चलो जीजी, ढोलक लाओ, आज तो मैं सोहर भी गाऊंगी और नाचूंगी भी, तब तक नाचूंगी, जब तक मेरे पैर ना थक जाए।
बहुत धूमधाम से बच्चे का बरहौं मनाया गया, सारे गांव को न्योता दिया गया, घी में छप्पन भोग बने, बाह्मणो को अलग से सात्त्विक भोजन कराया गया।
करूणा ने बच्चे का नाम कान्हा रखा, सुलक्षणा ज्यादा ममता नहीं रखती थी बच्चे से, बच्चे को देखकर सुलक्षणा को प्रकाश के दिए धोखे की याद आ जाती थी, ऐसे ही डेढ़ साल बीत गए।
फिर एक दिन बच्चा छत पर जीजी के साथ धूप सेंक रहा था, बच्चा छत से थोड़ा आगे की तरफ बढ़ने लगा, करूणा ने नीचे से देखा उसे लगा कान्हा अकेला है, उसे आवाज दी तो और आगे बढ़ेगा, वो दौड़कर सीढ़ियों पर जा ही रही थी, कान्हा को बचाने, तभी एकाएक उसका पैर फिसला, और वो सीढ़ियों से लुढ़क कर नीचे आ गई, तभी जीजी आवाज सुनकर बच्चे को लेकर नीचे आई देखा तो करूणा के सर से बहुत खून बह रहा है, उसने जल्दी से फतेह को बुलाया, करूणा को जीप में डालकर सब लोग अस्पताल ले गये।
इलाज के बाद करूणा को होश आया, वो बात करने में असमर्थ थी, इशारे उसने फतेह और सुलक्षणा को बुलाया, अपने हाथ से एक-दूसरे का हाथ मिलवा कर, वो निर्जीव हो गई।
पूरे सोलह-श्रृगांर के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया।
करूणा के जाने के बाद ठाकुर फतेह सिंह बहुत उदास रहने लगे, जीजी बहुत समझाती कि तेरे ऐसे उदास रहने से वो वापस तो नहीं आ जाएगी, तू ठीक से खाता-पीता भी नहीं, ऐसे कैसे चलेगा, तू घर का मुखिया हैं, तुझसे ही ये घर चल रहा है, समझदारी से काम लें।
कैसे भूल जाऊं, करूणा को, जीजी, ये मेरे बस में नहीं है, फतेह सिंह बोले।
करूणा के जाने के बाद कान्हा का ख्याल पूरी तरह से फतेह सिंह और जीजी ही रखते थे, सुलक्षणा अब भी बच्चे से कटी-कटी रहती, प्यार तो करती थी कान्हा से लेकिन कभी कभी सोचती कि इसी बच्चे के कारण ही वो आज इस रास्ते पर खड़ी है और फ़िर से उसे प्रकाश की बेवफ़ाई याद आ जाती।
एक दिन जीजी ने सुलक्षणा से आकर कहा, करूणा के जाने के बाद अब तुम ही फतेह की ब्याहता हो, इस घर की मालकिन हो, ये सबकुछ तुम्हारा है, मैं बड़ी होने के नाते बस सलाह दे सकती हूं, मानना ना मानना तुम्हारी मर्जी, करूणा की भी मरते समय यही इच्छा थी कि तुम और फतेह एक हो जाओ, तुम फतेह को अपना लो, मेरा भाई बहुत अच्छा है, करूणा के जाने से तो जैसे उसकी मुस्कराहट ही चली गई है,
तभी कान्हा के रोने की आवाज़ आई, जीजी बोली, अच्छा मैं जाती हूं, कान्हा क्यो रो रहा है, जरा देखूं तो, मेरी बात पर जरा गौर करना।
पहले सुलक्षणा सिंदूर नहीं लगाती थी लेकिन उस दिन के बाद जीजी के इतना कहने पर मांग में सिंदूर भरने लगी, करूणा की तरह सारे व्रत-उपवास करने लगी, घर की ज्यादातर जिम्मेदारियां सम्भाल ली, यदा-कदा वो अब सबकी नजरें बचाकर फतेह सिंह को भी देखने लगी लेकिन फतेह सिंह कभी भी भूलकर भी उसकी तरफ नज़र तक नहीं डालते, यहां तक कि खाने के लिए जीजी से कहते या किसी नौकर से, अब सुलक्षणा भी चाहे दिन हो या रात जब तक फतेह सिंह खाना नहीं खा लेते, वो खाना नहीं खाती, उनका हमेशा इंतजार करती।
ये सब देखकर जीजी को अच्छा लगता कि चलो, अभी भी मेरे भाई का घर उजड़ा नहीं है, सुलक्षणा के मन में मेरे भाई के लिए प्यार उमड़ रहा, फतेह भी एक ना एक रोज ये बात समझ जाएगा।
जीजी अब सुलक्षणा को ठीक से समझने लगी थी, कि सुलक्षणा दिल की बुरी नहीं है, उस समय परिस्थितियां ही कुछ ऐसी थी कि ___
जीजी हमेशा सुलक्षणा को समझाती, पति को खुश रखना है तो थोड़ा बन-संवर के रहा कर, सुलक्षणा शर्म से लाल हो जाती और कहती, कैसी बातें करती हो जीजी? जीजी बोलती, भाई ननद हूं तेरी, मजाक तो कर ही सकती हूं, और मुस्कुरा देती।
सुलक्षणा अब बन-संवर के भी रहती, तब भी फतेह उसकी तरफ नहीं देखते, बस हमेशा की तरह कमरे में आते फर्श पर चटाई बिछाकर सो जाते, सुलक्षणा से कभी बात भी नहीं करते।
आज करवा -चौथ है, जीजी ने सुलक्षणा से करवा- चौथ का व्रत रखने के लिए कहा है, सुलक्षणा ने भी हाथों में मेहंदी लगा रखीं हैं और जीजी से पूछ रही है, जीजी शाम को कौन सी साड़ी और गहने पहनूं, जीजी बोली, तू दुल्हन की तरह तैयार होना आज, लाल साड़ी और सारे गहने पहनकर।
तभी जीजी को कुछ याद आया, वो फतेह के पास गई और पूछा, कहां जा रहे हो?
फतेह बोले, आज शहर तक जा रहा हूं, थोड़ा काम है, आप कहो, कुछ काम है,
हां, आज करवा- चौथ है, सुलक्षणा ने तेरे लिए व्रत रखा है, शाम को जल्दी आना और उसके लिए साथ में कुछ उपहार लेते आना, एक अच्छी सी साड़ी और एक मंगलसूत्र।
फतेह बोला, ठीक है जीजी।
शाम को सुलक्षणा, लाल साड़ी और गहने पहनकर बहुत ही खूबसूरत लग रही थी, जीजी ने तुरंत काला टीका लगाया, पूजा की सारी तैयारी हो गई, चांद भी निकल आया लेकिन फतेह सिंह को बहुत देर हो गई थी और वो अब तक नहीं लौटे थे, सुलक्षणा भूखी-प्यासी इंतजार कर रही थी और जीजी से बोली जीजी आप खाना खा लो, लेकिन जीजी नहीं मानी, बोली त्यौहार का समय है तुम दोनों भूखे बैठे हो और मैं खा लूं।
तभी आंगन के बाहर के दरवाज़े की खुलने की आवाज़ आई, शायद फतेह आ गया था, जीजी ने कहा तुरंत, हाथ पैर धोकर ऊपर आजा, फतेह थोड़ी देर में ऊपर आया, सूलक्षणा ने छलनी में चांद देखा फिर फतेह का चेहरा देखा, आज उसने पहली बार गौर से फतेह का चेहरा देखा था, लेकिन फतेह की नज़रें नीचे थी उसने एक बार भी सुलक्षणा की तरफ नहीं देखा।
फिर सुलक्षणा ने पूजा करके फतेह के पैर छुए और उसने दोनों पैरों का स्पर्श इस तरह किया कि जैसे माफी मांग रही हो और उसकी आंखें भी भर आईं थीं फिर जीजी बोली फतेह पानी पिला बहु को, फतेह ने पानी पिलाया, जीजी बोली जो उपहार लाया हो तो दे दे, फतेह ने मंगलसूत्र और साड़ी सुलक्षणा को थमा दी।
जीजी बोली अब मंगलसूत्र लाया है तो पहना भी दे, फतेह ने मंगलसूत्र सुलक्षणा को पहना दिया, जीजी बोली आज पहली बार करवा-चौथ का व्रत रखा है, थोड़ा सिंदूर भी लगा दे, फतेह ने सिंदूर भी लगा दिया, फिर नीचे जाकर सबने खाना खाया।
जीजी बोली, आने में इतनी देर कैसे हो गई, फतेह बोला, जीजी एक मित्र के यहां ये साड़ी और मंगलसूत्र भूल आया था, शाम तक गांव आ गया था फिर याद आया कि साड़ी और मंगलसूत्र तो मित्र के यहां छूट गये, फिर वापस जाकर लेकर आया।
करवा -चौथ की रात बिस्तर पर सुलक्षणा सजी-धजी बैठी थी, फतेह ने उसकी ओर देखा भी नहीं, अपना बिस्तर फर्श पर बिछाया और लेट गया, उधर सुलक्षणा, फफक-फफक कर रो पड़ी।
फिर दूसरे दिन उसने शाम के समय करूणा की साड़ी पहनी और करूणा की तरह तैयार हो कर बिस्तर पर बैठ गई, जीजी से कह दिया कि वो आए तो खाना दे दिजियेगा, मेरी तबीयत ठीक नहीं है, फतेह सिंह खाना खाकर आए और इस तरह से सुलक्षणा को करूणा के कपड़ों में देखा और खींचकर गाल में ज़ोर का थप्पड़ मारा, बोले तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई करूणा के कपड़ों को हाथ लगाने की, खबरदार जो आज के बाद ऐसा किया।
सुलक्षणा फूट-फूटकर रोने लगी, आप किस बात का बदला ले रहे हैं, मुझे लगा कि मैं दीदी की तरह लगूंगी तो आप मुझे पसन्द करने लगेंगे, मैं आपसे प्यार करने लगी हूं, आपको ये बात क्यो नहीं समझ आती।
और फूट-फूट कर फिर से रोने लगी, लेकिन फतेह सिंह बिस्तर बिछा कर करवट ले कर लेट गये, उनकी आंखें भी भरी हुई थी, उनके मन में भी थोड़ी बहुत प्यार जाग रहा था, न सुलक्षणा के लिए।
जीजी को रात की सारी बात पता चली तो उन्होंने सुलक्षणा को समझाया कि उसके मन में भी कहीं ना कहीं थोड़ा बहुत प्यार है तुम्हारे लिए, इसलिए तो करवा- चौथ वाले दिन दोबारा जाकर अपने दोस्त के घर से मंगलसूत्र और साड़ी ले आया था फिक्र मत कर सब ठीक हो जाएगा।
जीजी बोली कल बिटिया और दामाद जी आ रहे हैं, खबर भिजवाई है, घर में थोड़ी चहल-पहल हो जाएगी, थोड़ी तैयारी कर लो दो दिन के लिए ही आ रहे हैं।
दूसरे दिन जीजी की बेटी और दामाद आ गये, ऐसे बातों- बातों में, दामाद जी ने कहा, मामा जी आपके खेतों में धान बहुत होता है ना, मेरे एक व्यापारी मित्र हैं, वो चावल का व्यापार करते हैं, वो आपसे थोक के भाव चावल खरीदना चाहते हैं, अगर आपका मन हो तो मैं उन्हें बुला लेता हूं तब आपलोग आपस में अपनी व्यापारिक बातें कर लें।
फतेह सिंह बोले ठीक है, आप जैसा ठीक समझें दामाद जी।
दूसरे दिन वो व्यापारी उनके घर आ गया, लेकिन सुलक्षणा उसे देखकर घबरा गई, क्योंकि वो कोई और नहीं प्रकाश था।
प्रकाश के आ जाने से सुलक्षणा बहुत ही परेशान हो गई थी और प्रकाश भी उसे वहां देखकर चकित था, उससे अकेले में मिलने के बहाने ढूंढने लगा, सुलक्षणा को ऐसे परेशान देखकर, जीजी ने पूछा ही लिया, क्या बात है? बहु इतनी खोई-खोई और इतनी परेशान क्यों दिख रही हो, तभी सुलक्षणा जीजी के गले लगकर रो पड़ी, बोली जीजी मेरा अतीत मुझे जीने नहीं देता, मैं जितना भूलने की कोशिश करती हूं, घूम-फिर कर सामने आ ही जाता है, कहीं कान्हा के रुप में और कहीं.............
रुक क्यों गई, अब आगे बोलेगी, जीजी बोली।
सुलक्षणा बोली ये जो हमारे घर व्यापारी बनकर आया है, यही कान्हा का बाप है, इसी ने मुझे धोखा दिया था, जीजी मुझे बहुत डर लग रहा है इससे , ये कहीं कुछ उल्टा-सीधा ना कर दे, वैसे भी ठाकुर साहब ने मुझे अभी तक अपनाया नहीं है, इसके आ जाने से मेरी बसी बसाई गृहस्थी ना बर्बाद हो जाए।
जीजी बोली डर मत बहु, ऐसा कुछ नहीं होगा, प्रकाश तेरा अतीत है और फतेह तेरा आज, तुझे किसी से इतना डरने की जरूरत नहीं है, जीजी और सुलक्षणा के बीच की बातें, दरवाज़े के पीछे खड़े फतेह ने सुन ली।
सुलक्षणा जिस बात से डर रही थीं, वहीं हुआ___
शाम का समय था, सब छत पर बैठकर चाय-नाश्ता कर रहे थे, सभी गरम-गरम पकौड़ियों का आनंद ले रहे थे, पकौड़ियां खत्म हो रही थी, तभी जीजी बोली, बहु पकौड़ियां कम हो रही है, जरा नीचे से और ले आ, सुलक्षणा बोली अच्छा जीजी।
सुलक्षणा जैसे ही नीचे पहुंचीं, वैसे ही पीछे-पीछे प्रकाश लघुशंका के बहाने नीचे आ गया और सुलक्षणा का हाथ पकड़ने की कोशिश की, सुलक्षणा ने अपना हाथ छुड़ा लिया और बोली दूर रहो मुझसे, प्रकाश बोला, मुझे तुमसे बात करनी है सुलक्षणा, मैं तुम्हारा वहीं प्रकाश हूं, जिससे तुम बहुत प्यार करती थी, सुलक्षणा बोली चले जाओ यहां से मुझे कुछ नहीं सुनना।
प्रकाश बोला, इतना घमंड, इतनी अकड़, बहुत सती -सावित्री बन रही हो और प्रकाश ने सुलक्षणा को पकड़ने की कोशिश की, सुलक्षणा ने जोर से जीजी को आवाज दी, जीजी बूढ़ी होने की वजह से नीचे जल्दी जाने में असमर्थ थी तो उन्होंने तुरंत फतेह से कहा, जा नीचे जल्दी जाकर देख क्या बात है? बहु क्यों चिल्लाई?
फतेह सिंह ने देखा, प्रकाश सुलक्षणा को छूने की कोशिश कर रहा है और सुलक्षणा उससे खुद को छुड़ाने की, फतेह सिंह ने प्रकाश को पकड़ा और अच्छे से तीन-चार थप्पड़ लगाकर नीचे पटक दिया, प्रकाश उठा और बोला, ठाकुर साहब आप जिसे पवित्र समझ रहे हैं, उसे मैं ना जाने कितने बार अपवित्र कर चुका हूं, ये कोई सती-सावित्री नहीं है, तभी उठते ही ठाकुर साहब ने एक जोर का थप्पड़ प्रकाश के गाल पर और धर दिया और बोले____
खबरदार! जो मेरी पत्नी के बारे में कुछ भी उल्टा-सीधा बोला तेरी जुबान निकाल दूंगा, मेरी पत्नी कितनी पवित्र है और कितनी सती-सावित्री , मुझे ये तुमसे जानने की जरूरत नहीं है, निकल जाओ मेरे घर से और आज के बाद ये मनहूस शक्ल दिखाई, तब तक सब भी नीचे आ गये, प्रकाश ने धमकी देना शुरू कर किया कि मैं किसी को नहीं छोडूंगा, बदला लेकर रहूंगा और दामाद जी ने धक्के देकर प्रकाश को बाहर निकाल दिया और बोले, तुम इतने घटिया आदमी हो, मैंने नहीं सोचा था।
फिर दामाद जी ने माफी मांगी कि मामा जी मुझे क्षमा करें, मेरी वजह से आपको इतनी परेशानी हुई, फतेह सिंह बोले नहीं दामाद जी आप क्यों क्षमा मांग रहें हैं, वो ही घटिया इंसान था।
रात में सब खाना खाकर अपने अपने कमरे में चले गए, सुलक्षणा बहुत डरी हुई थी, अपने कमरे में जाने से डर रही थी, फिर जीजी ने समझाया, तेरी क्या गलती है, तू क्यों डर रही है, फतेह कुछ नहीं कहेगा, उसे कुछ कहना होता तो उस समय प्रकाश के सामने तेरा पक्ष ना लेता, तू अपने कमरे में जा, सुलक्षणा अपने कमरे में गई देखा तो फतेह, अपनी चटाई बिछाकर लेट गए हैं, सुलक्षणा उनके पास गई और पैर पकड़ कर उनके पैरो में अपना सर रखकर बोली मुझे माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब!
फतेह सिंह ने सुलक्षणा को प्यार से उठाया और बोले मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूं, उस दिन मैंने, तुम्हारे और जीजी के बीच हुई बातें सुन ली थीं, मुझे पता है कि तुम निर्दोष हो लेकिन मुझे थोड़ा और समय चाहिए, अब जाओ सो जाओ।
और बिटिया और दामाद जी भी दो दिन रहने के बाद चले गए।
इसी तरह दस-बारह दिन निकल गये, तभी एक दिन___
बहुत दिन चढ़ आया था लेकिन सुलक्षणा बिस्तर से नहीं उठी, उस दिन भगवान की पूजा भी नहीं हुई थी, तभी जीजी सुलक्षणा के कमरे तक आईं और आवाज दी, बहु........
तभी सुलक्षणा ने कमरे के अंदर से आवाज दी, जीजी अंदर मत आइए, मुझे बहुत तेज बुखार है और साथ में शीतला माता भी निकल आईं हैं, वैसे भी ये छुआछूत का रोग है, आप कान्हा को लेकर अपने साथ रखिए, मेरे पास ना आने पाए।
जीजी ने सब कुछ फतेह को बताया, फतेह ने कहा कैसे उपचार होता है रोगी का मुझे बताये जीजी, मैं करूंगा, रोगी की देखभाल, आप बस कान्हा को दूर रखियेगा, वैसे भी कोई नौकरानी भी नहीं तैयार हो रही , सेवा के लिए तो मुझे ही करनी पड़ेगी, सुलक्षणा की देखभाल और आपकी भी उमर हो गई है, आप बस कान्हा का ख्याल रखिए।
फतेह ने हफ़्ते भर सुलक्षणा का ख्याल रखा, उसे रोज नीम के पानी से स्नान करवाता, बिस्तर पर नीम के पत्ते बिछाता, अपने हाथों से खाना खिलाता, बुखार होने पर, माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखता, उसका सर भी दबाता, उसके बालों में तेल लगाता, उसके बाल भी बनाता, और ये सब देखकर सुलक्षणा मारे खुशी के निहाल हुई जाती, कभी कभी उसकी आंखों से खुशी से पानी भी बहने लगता, फतेह सिंह पूछते कि क्यो रो रही हो तो वो कहती ये तो खुशी के आंसू हैं, आपको पाकर मैं तो धन्य हो गई।
ऐसे ही पन्द्रह दिन के बाद सुलक्षणा ठीक हो गई, जीजी सबको लेकर मंदिर गई और शीतला माता की भी पूजा करवा दी, सुलक्षणा और फतेह के हाथों कन्या भोज भी करवाया, फिर सब घर आए।
जीजी ने घर आकर मालिन को बुलवा भेजा, बोली आज इस कमरे को फूलों से सजाओं, बस कमरे से फूलों की खूशबू आनी चाहिए, जाते समय फतेह को दरवाजे के पास मालन मिली, उससे पूछा भी कि तुम यहां क्यों आई थी?वो बोली, आपकी जीजी ने बुलवाया था, फतेह अंदर आए और जीजी से पूछा, जीजी मालिन को क्यो बुलवाया था? जीजी बोली, तेरी और सुलक्षणा की सुहागसेज सजवाने के लिए, शाम को आएगी फूल लेकर सेज सजाने, इतना सुनकर फतेह सिंह मुस्करा दिए।
जीजी बोली, जब उससे प्यार करने लगा है तो अपना भी ले, जा और बाजार से एक अच्छी साड़ी और मिठाई ले आ, फतेह मुस्कुराते हुए, बाजार चला गया, फिर जीजी बोली अब तू क्या पर्दे की आंड से सुन रही है, चल बाहर आ, और सुलक्षणा शरमाते हुए बाहर आईं और खूशी के मारे जीजी से लिपट गई।
शाम को सारी तैयारियां हो चुकी थीं, कमरा भी सज गया था, तभी हवेली में प्रकाश दाखिल हुआ और बच्चे को ले जाने लगा, जीजी ने देखा और शोर मचाने लगी, फतेह आया उसने कान्हा को छीना , इतने में प्रकाश ने चाकू निकाला, फतेह को मारने की कोशिश की, फतेह ने अपना बचाव किया लेकिन उसकी बांह में चाकू लग गया, तभी किसी ने मिट्टी खोदने वाली कुदाल से प्रकाश के सर पर वार किया, प्रकाश के सर पर गहरी चोट लगी और वो वही ढेर हो गया, प्रकाश पर वार किसी और ने नहीं सुलक्षणा ने किया था।
तभी सुलक्षणा के हाथ से कुदाल छीनकर, फतेह ने ले ली, पुलिस आई, फतेह ने सुलक्षणा को चुप रहने को कहा और खुद जुर्म कबूल कर लिया, अदालत में केस चला, और ये साबित हो गया कि अपने बचाव में फतेह सिंह ने प्रकाश का खून किया था और फतेह सिंह को सिर्फ एक साल की सजा हुई।
एक साल बाद फतेह सिंह जेल से रिहा हो गया।
आज सुलक्षणा और फतेह सिंह की मधु-चन्द्र रात्रि बेला है, दोनों बहुत खुश हैं और ये थी दोनों की अद्भुत प्रेम कहानी।

