आ अब लौट चलें
आ अब लौट चलें
सुबह का भूला
शाम में है,
किसी के
इंतज़ार में
कल जो हुई
तक़रार
अब सुलझा
लेते है मेरे यार।
ये वक्त का
सिलसिला यूं ही
चलता रहेगा,
कारवां भी कुछ
यूं बनता ही
रहेगा।
जब मान ही ली है,
गलती तो
माफ़ी भी दीजिये,
कुछ एहसान ए दोस्तो
हम पर भी कीजिए।
यूँ ही नही सुबह का भूला
शाम को लौट आता है
छोड़ के सारे गम
तू ही मुझे भाता है।
ऐ मेरे यार सच कहूँ
तुझसे पहले का मेरा
नाता है।
