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Amit Kumar

Abstract

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Amit Kumar

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बने शागिर्द बैठे थे..

बने शागिर्द बैठे थे..

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बने शागिर्द बैठे थे, सब के सब भेड़िया निकले,

थी चाहत राजशाही की, फ़क़त विद्रोह कर बैठे,

किया षड्यंत्र था ताउम्र, और वादा खिलाफी की,

ये भी षड्यंत्र था इनका, अभी जो रोड पर निकले।


ये साहब वादे पर वादा, नित नए रोज करते थे,

हमेशा जुमलों से शुरुआत, करके पेट भरते थे,

अभी जो वादे थे उनके, वो पूरा हो रहे हैं सब,

वो वादे पूरे हों उनके, नहीं वो सोच रखते थे।


अगर पैदा हुए उस वंश में, जो राजा होते थे,

परस्पर अक्ल तुमको है, वहाँ जो राजा रखते थे।

यकीं मानो नहीं मुमकिन, हमेशा एक सा रहना,

बदलता नियम है संसार का, सब लोग कहते थे।


हमारी आरज़ू थी क्या, कुचल बेख़ौफ़ तुम निकले,

ज़रूरत थी तुम्हे जब भी, तुम अपने घर से तब निकले।

हज़ारों ख्वाहिशें पलती रही, ताउम्र इस दिल में,

मग़र हर बार जब "जीते", नहीं फिर इस तरफ निकले।


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