मन के भाव
मन के भाव
हम सब के मन के भाव ऐसे जैसे जी रहे दोहरा रूप,
देखो आज हर व्यक्ति का बदल गया कैसे स्वरूप I
आज समाज में मन के भाव नक़ाब की तरह बदलते हैं,
कई बार देखा है हम अपनी बात पर ही नहीं चलते हैं I
विचारों की इस भाग दौड़ सब कुछ जैसे बदल गया है
मन ने चाहा कुछ करना पर कुछ और ही कर रहा है I
अपनों को खुश रखने की मजबूरियाँ मन के भाव बदल रहा है,
परिवार को खुश रखने की खातिर आज इंसान भी बिक रहा है I
रोजमर्रा के कामों में जुटा हुआ है, काम के बोझ तले दब रहा है,
पर घर पर अपनों संग हर दर्द छुपाए एक अलग ही मुस्कान है I
सोचा था मंजिल अपनी पा ही लूँगा, दुःख अपनों को कभी न दूंगा,
पर जो सोचो वो कब होता है, गरीब तो गरीबी पर रोता है I
हर रिश्ता निभाने में मन के भावों का खेल अजब ही होता है,
अपने सपनों को छोड़ वह रिश्तों को अपने कन्धों पर ढोता है I
मन में बसे थे जो सतरंगी सपने वो सब अब कितने दूर हुए,
हम अपने दुखों को छुपा कर खुश रहने को मजबूर हुए I
क्या- क्या सोचा था जीवन में पर क्या हो जाएगा ये न सोचा था,
खुशियों का गला दबाकर हम अपने मन भाव बदल देंगे I
