पीछा करती आँखें
पीछा करती आँखें
वे मासूम आँखे मेरा पीछा करती रहती है
जैसे वे कोई सवाल कर रही हो
मेरे वजूद से
उन अनजान बातों के बारे में
जो घुमड़ती रहती है जाने अनजाने
मेरे दिल दिमाग मे
कभी वे कहती सी लगती है
बेखौफ होकर मुझे
मेरी जरूरत में तुम नही थे मेरे साथ
जब भीड़ में अकेली थी मैं
लोग मेरे कपड़ों को तार तार कर रहे थे
और भीड़ में किसी कोने में दुबके खड़े थे तुम
सीधे सवाल करती है मुझे वे आँखे
क्या तुम भी ख़ामोशी से तांकते नही रह गये थे
जैसे द्रोपदी के चीरहरण में पांडव मौन थे?
वे गहरी आँखे मेरे अंदर तक झाँकती जाती है
जैसे मेरे उन गुनाहों का हिसाब माँग रही हो
जो शायद मैंने अनजाने में किये हो
मै मौन होता हूँ उसके सवालों से
जब भी गुजरता हूँ उसकी राह से
हैरान होता रहता हूँ मैं
कुछ कहे बिना वह सब कुछ कह देती है मुझे
वे मासूम आँखें मेरा पीछा करती रहती है

