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Sulakshana Mishra

Abstract

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Sulakshana Mishra

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काशी

काशी

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ये शहर है 

मन्दिरों का, शिवालों का

और भोलेनाथ के मतवालों का।


बहती यहाँ गँगा है,

जिसकी मस्ती में कण-कण रंगा है।

वो सुबह बनारस की

जहाँ गूँजे शंख भी और 

पड़ती है कानों में अज़ान भी।


साधुओं की मस्ती भरी टोली है कहीं

तो कहीं है फिरंगियों की पलटन

तो कहीं दिखती है हिप्पियों की थिरकन।


हो शाम जब

और हो घण्टियों की गूँज 

नन्हें दीपक डालें रोशनी जल कण पर

जब हो आरती गंगा के तट पर।


गलियों से गुलज़ार है 

ये शहर खुद शहरों में खास है।

बसते हैं जहाँ खुद बाबा विश्वनाथ

और हों खुद भैरव नाथ कोतवाल जहाँ

कहने ही क्या उस नगरी के !


बस जब हो संध्या जीवन की

मिले पनाह मणि कर्णिका की।

जो मिले जन्म दोबारा

तो हो धरा काशी की।


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