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मुकम्मल ख़्वाब
मुकम्मल ख़्वाब
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© Shailaja Bhattad

Drama

1 Minutes   6.9K    7


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सच ज्ञात है पर जागरण का पथ अज्ञात है।

थोड़ी सी धूप कहीं थोड़ी सी छाँव है ।

लेकिन पेड़ों का अस्तित्व तार-तार है ।

नदियों में उठ रही तरंगें अपार हैं,

लेकिन पानी आरपार है ।

न जीवन न पत्तों का बहाव है ।

हर चीज़ सृजन के प्रयोजन से परे है।

हर आंख बेजान है ।

जीवन तड़पती मछली सा ,

उद्देश्यविहिनता का ही तो परिणाम है ।

उठ जीवन पथ पर बढ़ें।

ऐसा ख़्वाब बुनना

अभी तो सिर्फ़ ख़्वाब है।


मझधार से बाहर निकल,

खुद को संवारने की दरकार है ।

हर पल ख़्वाबों को बुने,

हकीकत का लिबास पहनें ,

और फिर यादों की फ़्रेम सज़ाएं

क्या ये सांचे में ढलते हमारे ख़्वाब हैं।

Life Lessons Dreams

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