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V. Aaradhyaa

Romance Inspirational

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V. Aaradhyaa

Romance Inspirational

ये गँवार घर की गृहलक्ष्मी है

ये गँवार घर की गृहलक्ष्मी है

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अक्सर आकाश माधवी को उसकी भाषा और उच्चारण की कमज़ोरी के लिए डांटता तो माधवी कुछ नहीं बोलती। यहाँ तक कि उसके मज़ाक उड़ाने को भी मज़ाक़ में ही लेती थी।

पर आज उसे आकाश की बात थोड़ी चुभ गई थी।


सुबह उठना आकाश को बिलकुल पसंद नहीं था।

इसलिए वह सुबह सुबह ही माधवी से नाराज़ हो गया।

सुनिए ! अब जल्दी उठ जाइए। बाबूजी और मांजी की ट्रेन आती होगी सो इस्टेशन के लिए देर हो जायेगी!"

माधवी ने आकाश को उठाते हुए कहा।

आकाश ने एक बार माधवी को देखा फिर कुनमुनाकर करवट बदलकर सो गया।

"आप नहीं उठेंगे तो जरूर लेट हो जाएगा!"

अब माधवी ने आकाश के एकदम पास आकर कहा तब अचानक आकाश ने चौंककर मोबाइल उठाकर समय देखा तो उसमें साढ़े सात बज रहे थे।


तभी उसके मूँह से निकला,

"ओ माय गॉड! अभी तो साढ़े सात बज गए। साढ़े आठ बजे तक तो अम्मा बाबूजी की ट्रेन आ जाएगी। मुझे इतने समय में तैयार होकर निकलना भी है। तुम जल्दी से मेरे लिए चाय लेकर आओ!"

"वही तो मैं कह रही हूँ । ओ माय गाड कहने से नहीं होगा। जल्दी से तैयार होइए और जाइए!"

माधवी के इतना कहते ही आकाश थोड़ा चिढ़ सा गया।

स्वर में थोड़ी नाराजगी लाकर बोला,


"ओहो.... माधवी! तुमसे कितनी बार कहा है कि अगर तुम अंग्रेजी नहीं बोल सकती तो मत बोलो कम से कम ऐसे उच्चारण से अंग्रेजी की टांग तो मत तोड़ो। ओ माय गॉड होता है गाड नहीं समझी! तुम बस गंवार की गंवार ही रहोगी!""

"ओके बास "

माधवी ने नाटकीय अंदाज़ में बोल कर माहौल को हल्का करने की कोशिश की तो आकाश बोल पड़ा।

"तुम पता नहीं कब सुधरोगी? मॉडर्न बनने में तुम्हें अभी बहुत समय लगेगा!"

सुनकर माधवी जबरदस्ती मुस्कुराई लेकिन उसका हंसता हुआ चेहरा बुझ सा गया था।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ था जब आकाश ने उसकी बोली और भाषा के उच्चारण पर ऐसे कटाक्ष ना किए हों।

उसका मन किया कि वह आकाश से पूछे कि,


"मैं किस बात में कम हूँ जो मुझसे ऐसा व्यवहार करते हैं ?"


दरअसल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाके से आई थी माधवी। गांव के स्कूल में पढ़ी थी और उसके बाद कॉलेज भी उसने पास के शहर से किया था। शुरू से हिंदी माध्यम से पढ़ाई किया था इसलिए अंग्रेजी में उसका हाथ थोड़ा तंग था। चलो... व्याकरण तो उसने अच्छे से पढ़ा था तो उससे लिखीत में तो गलती नहीं होती थी हाँ, उच्चारण में प्रदेश विशेष की झलक आ जाती और हिंदी का टोन आ जाता था। वैसे तो वह शुरू से जहीन थी। जो काम सोच लेती वह करके रहती थी पर उसके उच्चारण उसका बस नहीं था।


माधवी के घर में खड़ी बोली वाली हिंदी बोली जाती थी। उस पर सरस्वती का वरद हस्त था। उसकी आवाज़ में हिंदी कविता और गाने सुन लेता कोई तो मुग्ध हो जाता। किसी भी पूजा पाठ में गणेश वंदना और सरस्वती वंदना गाने के लिए माधुरी को ही बुलाया जाता था। हिंदी में इतना सधा हुआ स्वर और उससे भी अच्छा स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण था माधवी का।


लगता है... उसके इन गुणों का महत्व आकाश के लिए कुछ भी नहीं था।

वैसे माधवी सर्वगुण संपन्न थी।


पर...इस मुई अंग्रेजी का क्या करे बेचारी...उसके कॉलेज में और स्कूल में भी किसी ने अंग्रेजी ठीक से नहीं पढ़ाई थी। और कई शब्द तो उसने शादी के बाद आकाश से मुंह के मुंह से पहली बार सुना था और उसका सही उच्चारण सीखा था। ऐसा अक्सर होता है,


जब हम किसी के मुंह से सुनते हैं और किसी शब्दों को बार-बार इस्तेमाल करते हैं तो उसका सही उच्चारण हम करना सीख जाते हैं। नहीं तो हम अपने अंदाज से जिन अक्षरों को जोड़कर कोई शब्द बनता है उसी के अनुसार उसका उच्चारण करने की कोशिश करते हैं। माधवी की बोली में स और श, र और ड़ के उच्चारण में भी बहुत गड़बड़ होता था। जबकि आकाश शुरू से ही शहर में रहा था और शहर में रहने की वजह से उसका रहन सहन एकदम टीपटॉप था। इसके अलावा उसमें थोड़ी दिखावे की प्रवृत्ति ज्यादा थी। इसलिए वह लोगों को यह दिखाता रहता है कि वह शुरू से ही शहरों में पला बढ़ा है और बहुत ही मॉडर्न है इसलिए अंग्रेजी बोलता था और उसने जॉब में आने के बाद जब मुश्किल होने लगी थी तो पार्ट टाइम इंग्लिश स्पीकिंग का कोर्स भी कर लिया था जिससे उसका उच्चारण और भी साफ हो गया था।

पर वह कितना भी मॉडर्न हो, उससे क्या होता है उसकी नजर में तो अपनी पत्नी का जरा भी सम्मान नहीं था। क्योंकि वह गांव से आई थी और साथ ही उसकी भाषा में गांव का एक पुट रहता था।


इधर माधवी पढ़ाई में तो बहुत अच्छी रही थी बस अंग्रेजी के उच्चारण का दोष हो जाता था नहीं तो इंग्लिश लिखने में भी उसे कभी परेशानी नहीं हुई। बात यह थी कि अच्छा माहौल नहीं मिलने की वजह से वह उच्चारण सही से नहीं सीख पाई थी। और एक उम्र के बाद यह सीखना सिखाना थोड़ी शर्मिंदगी जैसी बात तो लगती है.


इसलिए माधुरी अपने पति के तरफ से भी अपमान भरे शब्दों को सुनकर खून का घूंट पीकर रह जाती थी। क्योंकि अगर वह कहती कि,

" मैं ने यह शब्द पहली बार सुना है इसीलिए इसका उच्चारण सही से नहीं कर पाती हूँ!"


तब उसके स्कूल की पढ़ाई पर भी कटाक्ष किया जाता।


इसलिए वह आकाश के समक्ष कोशिश करती कि इंग्लिश ना ही बोले और इंग्लिश वाले शब्द बोलते हुए बहुत सतर्क रहती थी कि कहीं गलती ना हो जाए। इस वजह से उस पति पत्नी का रिश्ता सामान्य नहीं रह पाता था। और ऊपर से आकाश उस पर 'जाहिल' गंवार' जैसे शब्द अंग्रेजी में बोलकर उस पर कटाक्ष भी करता था और उसे अपमानित करने की कोशिश करता रहता था।


माधवी आकाश के साथ बीच बीच अपने सास ससुर के पास हो आते थे। अब पहली बार उसके सास ससुर उनके घर आ रहे थे। उन्हें लेने आकाश स्टेशन जा रहा था। अभी माधवी गर्भवती थी इसलिए आकाश के साथ स्टेशन नहीं जा रही थी।


जब आकाश के माता पिता यानी माधवी के साथ ससुर आए तब उन्होंने भी इस बात को गौर किया कि आकाश जब-तब माधवी का अपमान कर रहा है। वह भी एक विदेशी भाषा के सही उच्चारण नहीं होने की वजह से। तब उनको अपने बेटे आकाश की बुद्धि पर तरस आने लगा।



एक साल होने को आए हो थे आकाश और माधवी के विवाह को। इस बीच में वह कई बार ससुराल गई थी और सास-ससुर के साथ रहने का भी मौका मिला था। वह अपने मृदुभाषी सुशील बहू को बहुत पसंद करते थे। और यह भी जानते थे ऊपर से चांद दिखने वाली उनकी बहू पर माता सरस्वती का वरदान है। जैसा ज्ञान और संस्कार लेकर आई है बहू कि संस्कृत के श्लोक उसे यूँ कंठस्थ याद थे कि सुनकर आश्चर्य होता था। कविताएं तो यूँ रस ले लेकर, डूबकर पढ़ती जैसे कि काफी महीनों से प्रैक्टिस कर रखी हो

और हिंदी में किसी भी कवि का लेखक के दोहे और कविताएं उस से छुटी नहीं थी। खुद भी बहुत अच्छा लिखती थी माधवी।


आकाश कभी माधुरी की कविताएं ना तो सुनता था ना सुनने की कोशिश करता था। अगर सुन भी लेता तो उन कविताओं उन कहानियों का मर्म नहीं समझ पाता क्योंकि वह दिखावे की दुनिया में जी रहा था और अपनों से ज्यादा गैरों की परवाह करता था। और यहां तक कि उसे तो अपने माता-पिता भी गंवार लगते थे लेकिन उनको कुछ ना कह कर वह माधुरी को तहजीब और व्यवहार का संकेत उसे दे ही देता था और उसके उच्चारण के लिए तो बोलना उसका परम लक्ष्य था। प्रतिदिन की बातचीत में कोई ना कोई शब्द इंग्लिश का आ ही जाता और अगर माधवी उसका सही उच्चारण नहीं कर पाती तो आकाश अब उसे बुरी तरह झिड़कने भी लगा था। जिससे माधवी का मन बहुत आहत हो जाता था।


खैर....नियत समय पर ससुर आए और घर का माहौल बदल गया सब बहुत खुश थे उन्हीं दिनों सावन और कजरी को लेकर सोसाइटी के पार्क में त्यौहार मनाया गया और शाम में क्लब में सभी महिलाएं अपने नृत्य प्रदर्शन करके, गीत गाकर, कविता सुनाकर उल्लास मनाने वाली थी और सब को बुलाया भी गया था।


आकाश को माधवी ने एक दिन पहले ही बता दिया था कि इस सावन उत्सव में वह भी अपनी कविता और गाना सुनानेवाली है लेकिन आकाश के लिए हिंदी की कविताएं तो बिल्कुल फालतू बातें थी इसलिए उसने सुनकर भी अनसुना कर दिया।

बहरहाल माधवी उस दिन नियत समय पर सावन उत्सव में पहुंची और साथ में सास ससुर भी गए थे। हरी साड़ी, मेहँदी, कलाई में लाल हरी चूड़ियाँ और रुचिकर श्रृंगार किये हुए आज माधवी बिल्कुल अलग ही लग रही थी।


उस दिन कुछ ऐसा कुछ संजोग लगा कि आकाश घर की चाबी नहीं ले गया था। जब ऑफिस से आया तो घर पर ताला लटक रहा था। फोन करने लगा तो अम्मा और बाबूजी और माधवी में से किसी ने फोन नहीं उठाया। तंग आकर वह दूर से सोसाइटी कम्युनिटी हॉल के पास पहुँचा तो हवा में एक परिचित स्वर लहरी गूंज रही थी। जो निश्चय ही माधवी की थी।


आवाज का अनुसरण करके वह अंदर हॉल में पहुंच गया उसे याद आया कि माधवी इस पार्क में किसी फंक्शन होने की बात कह तो रही थी।


जब आकाश अंदर गया तो स्टेज पर माधवी सावन का कोई गीत गा रही थी,


"साजन सावन में प्रेम की हरियाली चुनरी ला दो!"


आकाश ने देखा पूरा हॉल मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था। कोई कोई माधवी के सुर की तारीफ कर रहे थे तो कोई उसके सधे हुए हिंदी के उच्चारण की दाद दे रहा था। तो कुछ औरतें उसके चमकते सौंदर्य को देखकर अभिभूत थी।


आकाश ने अपनी माधवी को गौर से देखा। सच...वह बला की खूबसूरत लग रही थी।

आत्मविश्वास से भरपूर अप्रतिम सौंदर्य की मल्लिका माधवी... उसका यह रूप तो आकाश के लिए बिल्कुल नया था।



उसके बाद माधवी को स्वरचित कविता सुनाने को कहा गया और माधवी ने सुंदर शब्दों से सजी हुई कविता स्पष्ट उच्चारण में सुनाई। अभी एक कविता खत्म हुई नहीं कि लोग वंस मोर वंस मोर कहने लगे। ऐसे ही लोगों के आग्रह पर माधव ने एक एक करके पांच कविता सुनाई।


उसके बाद जब वह नीचे आई तो आकाश को लगातार अपनी और देखता पाकर शरमा गई।

आज आकाश को अपनी पत्नी पर गर्व हो रहा था।


खामखा एक विदेशी भाषा के परफेक्शन के होड़ में वह अपनी पत्नी के अन्य गुणों को भी नहीं देख नहीं पा रहा था और उसे ज़ब तब शर्मशार करता रहा था। आकाश के इस व्यवहार से माधवी की स्वाभाविकता कहीं खो गई थी।


आज आकाश को अपने व्यवहार पर बहुत अफ़सोस हो रहा था।


 कई बार जब वह माधवी को गँवार कहता तो उसकी मां कहती,,


उसे तुम गँवार नहीं कह सकते। वह इस घर की गृहलक्ष्मी है!"


 आज उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था। भाषा की शुद्धता और उच्चारण से किसी इंसान को गवारिया मॉडर्न नहीं कहा जा सकता।

उस वक्त तो उसने माधवी का हाथ पकड़कर बड़े कहा था,

"मुझे तुम पर गर्व है!"

सुनकर जैसे माधवी का कलेजा जैसे जुड़ा गया।

अब आकाश माधवी की बहुत इज़्ज़त करने लगा था। उससे इंग्लिश के किसी शब्द का सही उच्चारण नहीं हो पाता तो आकाश उसे प्यार से सुधार देता था, जिससे माधवी को ज़रा भी बुरा नहीं लगता था।


अब अक्सर उनके कमरे से हँसने और खिलखिलाने की आवाज़ आती तो माधवी के सास ससुर बहुत खुश होते और सास माधवी की बलैईयाँ लेते हुए कहती,


"ऐसे ही खुश रहा करो बहू! और देखना... हंसमुख बच्चा पैदा होगा!"


बाबूजी भी कहाँ पीछे रहते?


आकाश के सिर पर हाथ फेरते हुए कहते,


"बेटा! पत्नी का सम्मान ज़रूर किया करो। जिस घर में गृहलक्ष्मी का अपमान होता है उस घर में ना तो खुशियाँ आती हैं और ना ही बरकत आती है!"


अब सूखी दाम्पत्य जीवन के इस राज को आकाश भी समझ गया था और माधवी का सम्मान करने लगा था। और पति से प्रेम और सम्मान पाकर माधवी भी खिली खिली रहने लगी थी।


(समाप्त )



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