Prashant Subhashchandra Salunke

Abstract


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Prashant Subhashchandra Salunke

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ये देश है वीर जवानों का....

ये देश है वीर जवानों का....

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वकील गुप्ताने कटघरे में खड़े छप्पन वर्षीय शब्बीर को धृणित नजरों से देखते हुए कहा, “जजसाहब, इसकी इस मासूम सी शक्ल पर मत जाइए, क्युंकी इस शक्ल के पीछे एक दरिंदा छुपा हुआ है। इस हेवान ने कॉलेज में बम रखकर उसको उड़ा देने की पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन भला हो उस अंजान शक्श का जिसने एन वक्त पर पुलिस को इतल्ला करके एक बड़े हादसे को होने से रोक दिया। वरना आज अगर इस शेतान ने अपने काम को अंजाम दे दिया होता तो न जाने कितने मासूम नौजवान लड़के लड़कियों की लाशें हमे देखने को मिलती। जजसाहब, खबर मिलते ही पुलिस जब कॉलेज पहुँची तब यह हेवान बम के पास आराम से बैठा हुआ पाया गया था। जैसे इसे कानून और पुलिस का कोई डर ही न हो! ऐसे दरिंदो को तो कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

जजसाहब ने अपना आखरी फैसला सुनाने से पहले शब्बीर को पूछा, “तुम अपने बचाव में कुछ कहना चाहते हो?”शब्बीर चुपचाप खड़ा रहा।

वकील गुप्ता ने गुस्से से कहा, “जनाब, जजसाहब आपसे कुछ पूछ रहे हैं।“

शब्बीर ने अदालत में बेठे लोगों की ओर एक नज़र देखते हुए कहा, “इन बुजदिलों के सामने मैं क्या कहूँ जजसाहब?”

वकील गुप्ता, “देखा जजसाहब, कॉलेज में बम रखने के अपने कृत्य को यह शख्स बहादुरी समझ रहा है।“

शब्बीर ने चीखकर कहा, “हाँ, मैंने कॉलेज में बम रखा था... और इस बात का मुझे जरा सा भी रंज नहीं है क्योंकि उसदिन किसी ने कुछ नहीं किया... सब चुपचाप तमाशा देख रहे थे। मैंने सबके सामने हाथ जोड़े... गिड़गिड़ाया मगर किसी ने कुछ नहीं किया... और आज आ गए है सब के सब मेरी सजा सुनने के लिए...”

जजसाहब ने वकील गुप्ता को चुप रहने का इशारा करते हुए कहा, “शब्बीर, मुझे लगता है की तुम अपने दिल में बहुत कुछ छिपा के बैठे हो... इसलिए कुछ वक्त के लिए यह भूल जाओ की तुम अदालत में खड़े हो और तुम्हे जो कुछ कहना है नि:संकोच मुझसे कहो।“

शब्बीर की आँख में आँसू थे। वह बोला, “जजसाहब, उसदिन मैं बहोत खुश था... मेरी छोटी बेटी महेरुननिशा का जन्मदिन जो था। मेरी महेरु पढाई लिखाई में बहोत होशियार थी, वह डोक्टर बनकर मेरा सपना पूरा करना चाहती थी। मैं अपनी बेटी को घुमाने ले गया... उसे “भारत” फिल्म दिखाई.... शाम को फिल्म देखने के बाद घर वापस आने के लिए हम बस में बैठे... बस में कॉलेज के कुछ छात्र और दुसरे मुसाफिर थे... बस शुरू होते ही अचानक कुछ लोग उठकर हमारे पास आए और मेरी बेटी की छेड़खानी करने लगे। यह देख मुझे बहोत गुस्सा आया। जब गुस्सा होकर मैंने इस बात का विरोध किया तब उन्होंने मुझे धमकी दी। अब वह अश्लील टिप्पणीओ के साथ मेरी बेटी को यहाँ वहाँ छूने लगे। यह देखकर मुझसे रहा नहीं गया मैंने फौरन खडे होकर एक गुंडे को एक तरफ धकेल दिया। मेरे इस हमले से वह दरिंदे बौखला गए और फिर मुझे बुरी तरह से पीटने लगे। उन में से दो गुंडे मेरी बेटी को उठाकर बस की पिछली सिट पर ले गए। मैं यह सब देखकर दंग रह गया। जैसे तैसे करके उनकी चुंगल से निकलकर मैं वहाँ बैठे मुसाफिरों के पास गया और उनको हमारी मदद करने के लिए कहा लेकिन कोई अपनी जगह से हिला नहीं। मैं सब से मिन्नते मांगता रहा, लेकिन कोई मेरी मदद के लिए आगे नहीं आया। अचानक एक गुंडे ने मेरे सिर पर वार किया और में वहीँ पर ढेर हो गया। वहाँ मेरी फुल सी बच्ची की इज्जत तार तार हो रही थी लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकता था। मुझमें अब उठने की ताकत बची नहीं थी लेकिन मुझे सब सुनाई दे रहा था। उन दरिंदो की हँसी और मेरी बेटी की चीख पुकार की आवाज़ आज भी मेरे कानो में गूंज रही है।

मेरी बेटी को बरबाद कर वह गुंडे वहाँ से चले गए। जाते जाते एक गुंडे ने मुझे लात मारते हुए कहा, “यहाँ क्या लेटा है? जा चुप करा अपनी बेटी को... देख नहीं रहा कमीनी कब से रो रही है....”

उनके चले जाने के कुछ देर बाद मैं जैसे तैसे करके उठकर अपनी पैरों पर खड़ा हुआ।लड़खडाते कदमों से चलकर जब मैं अपनी बेटी के पास पहुँचा तो उसकी हालत देखकर मेरे रोंगटे खडे हो गए। मेरी फुल सी बच्ची के शरीर से बुरी तरह से खून बह रहा था। वह पीड़ा से बिलबिला रही थी। उसकी यह बदहवास हालत मुझसे देखी न गई। मैंने फौरन अपना कुर्ता उतारकर उसके तन को ढक दिया। वह बुरी तरह से काँप रही थी।

तभी एक सुमसान सी जगह देखकर ड्राइवर ने बस को रोक दीया। कंडक्टर ने मेरे पास आकर मुझे बस में से निचे उतर जाने के लिए कहा। यह सुनकर मैंने उस कंडक्टर को हमे बस से निचे न उतारने के लिए बिनती की, मगर वह नहीं माना। बस में बैठे मुसाफिर भी बेशर्मो की तरह बोलने लगे, “जनाब, यह पुलिस केस है क्यों खामखाँ हम सबको पुलिस के लफड़े में फंसा रहे हो.... अपनी लड़की को लेकर पास के पुलिस स्टेशन में जाओ...”

मेरे लाख मना करने के बावजूद चार पाँच छात्रो ने मिलकर मेरी बेटी को उठाया और सडक के एक किनारे पर रख दिया। मैं भी क्या करता? मजबूरन मुझे भी उन छात्रो के साथ साथ नीचे उतरना पड़ा। मैंने देखा की मेरी बेटी की हालत धीरे धीरे ज्यादा बिगड़ रही थी। उसे फौरन इस्पितालमें ले जाना जरूरी था। मैंने आसपास नजर घुमाई तो उस सुमसान सी जगह पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था। उस सडक पर से बड़ी मुश्किल से एक दो गाड़िया गुजरती थी। मैं वहाँ से गुजरती हुई गाड़ियों को रोककर मेरी बेटी को इस्पिताल ले जाने की बिनती करने लगा लेकिन मेरी बेटी की हालत देखकर डर के मारे कोई रुकता नहीं था। मेरी बेटी धीरे धीरे अपना होश खोने लगी थी। बेहोश होने से पहले उसने मुझे पुकारा था, “अब्बू... अब्बू...”

मैं दौड़कर अपनी बेटी के पास गया और बोला, “मेरी बच्ची... तुझे कुछ नहीं होगा... अल्लाह पर भरोसा रख मेरी बच्ची....”

तभी एक गाडी को आते देख मैं उसे रोकने के लिए उसकी और लपकने ही वाला था की मेरी बेटी महेरुननिशा ने मेरा हाथ थामकर मुझे रोकते हुए कहा, “अब्बू, मुझे माफ़ कर दो... मुझे डोक्टर बनाने का आपका ख्वाब अधुरा ही रह गया...”

उसकी यह बात सुनकर मैं फुट फुट कर रोने लगा।तभी एक कार वहाँ आकर रुकी। कार में बैठे सज्जन ने सारा वाकया सुनने के बाद मुझे तसल्ली देते हुए कहा की पीड़ित लडकी को कार में बिठाकर वह पुलिस के फेरे में नहीं पड़ना चाहता लेकिन रास्ते में अगर कोई पी.सी.ओ. दिखेगा तो वह पुलिस को इस बारे में जरुर इतल्ला करेगा।“मैंने उसका शुक्रिया अदा किया।मेरी बेटी का शरीर धीरे धीरे करके अब ठंडा हो चुका था।

उस कारवाले के चले जाने से तकरीबन एक घंटे बाद वहाँ पुलिस आई। मेरी बेटी की हालत देखकर उन्होंने फौरन उसे नजदीकी इस्पिताल में पहुँचाया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मेरी फुल सी बच्ची महेरु मुझे छोडकर इस दुनिया से कब की रुखसत हो चुकी थी।उसदिन इस घटना को लेकर देशभर में काफी हंगामा पैदा हुआ।पूरे देशवासियों ने झूलुस निकाले।

मोमबत्ती लेकर हजारो नौजवान सड़क पर उतर आए।

लेकिन मैं जानता था यह सिर्फ और सिर्फ उनका नाटक था।मेरी बच्ची की इज्जत तितर बितर होती देखकर जिन छात्रों के सीने में आग नहीं लगी थी। वही छात्र आज हाथ में मोमबत्ती लिए सडक पर खड़े थे!

जितनी पीड़ा महेरु की मौत पर नहीं हुई उससे कई गुना ज्यादा पीड़ा उसदिन देशवासियों का यह नाटक देखकर हो रही थी। मैं उन सबको सबक सिखाना चाहता था। मैं उन देशवासीयों की आँखे खोलना चाहता था।“

जजसाहब बोले, “इसलिए आपने कॉलेज को बम से उड़ाने का फ़ैसला किया! मासूम छात्रो को बम से उड़ाना इस बात का तो हल नहीं हुआ। गुनहगारों को सजा देने के लिए मासूमों की जान लेना कहाँ का इंसाफ़ है? उन मासूमों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?”

शब्बीर बोला, “जज साहब, उसदिन बस में बैठे वे सब छात्र कॉलेज के थे.... जिन गाड़ियों को मैंने रोका था वह सब पढ़े लिखे थे... मतलब वह सारे किसी न किसी कॉलेज में पढ़े होंगे। अब आप ही सोचिए जो कॉलेज अपने छात्रो को स्त्री सन्मान, बहादुरी और मानवता का पाठ न पढ़ा सके वह कॉलेज बम से उड़ा देने के काबिल ही है! आज अगर महेरु का भाई यहाँ होता तो जो दर्द हमें झेलना पड़ा वह शायद नहीं झेलना पड़ता।“

शब्बीर की आँखों में आँसू थे।

जजसाहब ने पूछा, “महेरु का भाई भी है?”

शब्बीर ने आँख में आए आँसूओ को पोंछते हुए कहा, “हाँ, महेरु का एक भाई भी था... इरफ़ान... जो अपनी बहन महेरु को अपनी जान से ज्यादा चाहता था।“

जजसाहब ने वक्त की नजाकत देखते हुए पूछा, “तो अब आपका बेटा इरफ़ान कहाँ है?”

शब्बीर, “जन्नत में... मेरा बेटा इरफ़ान इस देश का जाँबाज सिपाही था। जिसने देश की खातिर अपनी जान कुरबान कर दी। मुझे इस बात का जरा भी अफ़सोस नहीं है बलके मुझे उसपर नाज़ है।

 

तिरंगे में लिपटे मेरे इरफ़ान के शरीर को जब उसके फौजी दोस्त कांधा दिए ले जा रहे थे तब मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया था लेकिन आज मेरा दिल यह सोच कर तडप रहा है की मेरे बेटे ने अपनी जान की कुरबानी किसके लिए दी? इस देश में बसे इन अहेसान फरामोश, मतलबी और बेहया देशवासीओ के लिए? जजसाहब, मेरा दिल यह सोच सोच कर तडप उठता है की वहाँ बोर्डर पर देश की सुरक्षा के लिए हमारे देश के जवान अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं और दूसरी तरफ देश में बसे गैरज़िम्मेदार यह इण्डियावाले देश को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे है।“

जजसाहब बोले, “यकीनन आपने बहोत कुछ सहा है, आपकी उम्र और आपके बेटे ने देश के लिए दी हुई क़ुरबानी को मधेनज़र रखते हुए... यह अदालत फैसला सुनाती है की... ”

शब्बीर ने चीखते हुए कहा, “जजसाहब, आप मुझे बेझिझक सजा सुनाइये... आप जरा सी भी इनायत मत बरतिए... में चाहता हूँ की आप मुझे कड़ी से कड़ी सज़ा दे ताकि मेरी आवाज़ देश के कोने कोने में बसे देशवासीओ तक पहुँचे। इस वाकये से सबक लेकर वे अपने व्यवहार में सुधार लाए। उन्हें पता चले की उनकी लापरवाही से, शिकार हुए लोग किस हद्द तक जा सकते है। अगर आज वे लाचार और बेबस लोगो की शिकायत नहीं सुनेंगे तो कल वह उन्हें बम की गुंजो में सुनाई देगी। जरा सोचिए क्या मुझे सजा का जरा सा भी खौफ होता तो में खुद पुलिस को बम के बारे में इतल्ला करता? पुलिस आनेवाली है इस बात का पता होने के बावजूद क्या में वहाँ आराम से बैठा रहता? कॉलेज को बम से उड़ाने का मेरा इरादा कतई नहीं था... मेरा इरादा लोगो तक सिर्फ मेरी आव़ाज पहुँचाने का था... मेरा इरादा सिर्फ इन ज़िंदा लाशों में जान फूंकने का था... मेरा इरादा मेरे प्यारे इरफ़ान की कुरबानी को सही अंजाम तक पहुँचा के ईस खोखले हो रहे देश को बचाने का था.. मेरा इरादा उन्हें इस बात को महसूस कराने का था की सिर्फ देश के लिए शहीद हुए जवानों पर आँसू बहाना ही देशभक्ति नहीं है... किंतु देश को अंदर से मजबूत करके देश के वीर जवानो की हौंसला अफजाई करने में भी सच्ची देशभक्ति है। अगर देश को बहेतर बनाना है तो यह बहुत जरूरी है की देशवासी अपने आप को बहेतर बनाए, आखिर कोई भी देश बनता तो उसके लोगों से ही है ! आदरणीय कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की पंक्तियाँ हंमेशा याद रखो... एक बच्चे की हत्या... एक औरत की मौत... एक आदमी का गोलियों से चिथड़ा तन... किसी शासन का ही नहीं... सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।”जजसाहब चकित नजरों से शब्बीर को देख रहे थे...

वहाँ बेठे हर किसी का सर शर्म से झुका हुआ और आँख नम थी।कोर्ट में सन्नाटा छाया हुआ था।छाए उस सन्नाटे में कहीं दुर रेडियो पर गीत बज रहा था।

ये देश है वीर जवानों का....



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