Radha Gupta Patwari

Abstract


4.0  

Radha Gupta Patwari

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ये डायरी भी न

ये डायरी भी न

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प्रिय डायरी,

आज तुम कुछ अपने बारे में सुनाओ।कैसी हो?मालूम हैं बहुत राज भरे पड़े हैं तुम्हारे इस दिल में।दबा दबा के रखे हैं। कुछ भी हो तुम हो बहुत विश्वसनीय।

न जाने क्या क्या नहीं जानती हो तुम सब कुछ तो।भावनाओं का पुलिंदा हो तुम।याद है न कभी पुराना गुलाब मिल जायेगा तो कभी आसूं से सूखे पन्ने।कभी अधमुड़े पन्ने तो कहीं अंत में लिखे पते।

तुम खुद में एक रहस्य हो ।क्या कहें। एक सच्ची दोस्त हो।

न खुद की कोई फिक्र है न फिंकने का गम।तुमने हंसी भी देखी है तो गम भी देखा है।नफरत देखी है तो गुस्सा भी झेला है।

तुम कोई और नहीं मेरी प्यारी डायरी हो।


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