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kanak lata tiwari

Horror


4.5  

kanak lata tiwari

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वो रास्ता कहाँ तक जाता था

वो रास्ता कहाँ तक जाता था

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मैं अपनी दुनिया में खुश था, खुश क्यों काफी खुश था। अच्छी खासी सैलरी वाली नौकरी और दिल्ली जैसा बड़ा शहर, बैंक की जॉब वो भी सरकारी। सब कुछ अच्छा चल रहा था की मेरे सर पर ट्रांसफर की मार लगी मेरा ट्रांसफर भी हुआ उन्नाव जैसे शहर में जिसका नाम भी मैंने ठीक से सुना भी नहीं था। करता क्या मन मार के चल दिया नए शहर की ओर, शादी हुई नहीं थी तो फैमिली और बच्चों की पढाई की चिंता नहीं करनी थी। हाँ भोजन पानी की चिंता थी क्योंकि दिल्ली में तो मम्मी के हाथ की बनी गरमागरम रसोई पर हाथ आजमाता रहता था और खाना बनाने के नाम पर मुझे एक कप चाय ही उबालना आता था।

खैर पहुँच गया उन्नाव में।

दिन में पहुंचा था और हमारे असिस्टेंट मैनेजर साहब ने मेरे लिए रहने की व्यवस्था कर दी थी। दो कमरों का किचन और अटैच्ड बाथरूम वाला छोटा सा फ्लैट था और मेरे लिए सही था। खाने के लिए उन्होंने छोटे चौराहे पर एक हिन्दू भोजनालय का नाम बता दिया था। दिन में ही बैंक की ड्यूटी मैंने ज्वाइन कर ली। ब्रांच में बड़ी भीड़ थी, क्योंकि उन्नाव एक जिला है तो विभिन्न गांव से आये हुए लोगो की लम्बी कतारें थी। काम निबटते शाम हो गयी। आने जाने के लिए अपनी कार तो थी ही। फ्लैट पर तरो ताजा होकर मैं बाहर खाने निकला।

दिन में जो जगह गुलजार लग रही थी वहां रात का सन्नाटा पसरने लगा था। किसी तरह मैंने खाना खाया। पूछताछ से पता चला की फ़िल्में वगैरा देखने के लिए मुझे कानपूर जाना होगा क्योंकि यहाँ दो हॉल थे और दोनों ही बंद पड़े थे, खैर वो तो बाद का मसला था। दूसरे दिन भी अपनी दिनचर्या में बीत गया आज भीड़ बहुत ज्यादा थी। शाम को मैं काफी थक गया था, इसलिए घर पर आराम करके मैं देर से भोजन के लिए निकला। भोजनालय में काफी भीड़ दिखी और ये भोजन के साथ सुरा का सेवन करने वालों की थी। अपने साथ बोतलें रखे हुए वे तेज स्वरों में खाने का आर्डर दे रहे थे। मुझे अजीब सा लगा लेकिन खाना तो खाना ही था। आज मैं अपने साथ कार नहीं लाया था अत: पैदल घर की ओर निकल लिया। रास्ते में मुझे दिशा भ्रम हो गया और मैं सामने की एक गली में चला गया।

वो गली आगे जाकर एक पतली गली में मुड़ गयी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कहाँ जा रहा हूँ जहाँ कदम ले जा रहे थे चल रहा था। सामने एक टूटे फूटे माकन में एक बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी। उसकी मन उसे शायद समझा रही थी तभी वो जोर से रोया मुझे भूख लगी है दो दिन से आप मुझे कुछ भी खाने को नहीं दे रही हो, औरत चुप हो गयी। मैंने आगे जाकर झाँका बिलकुल टूटे फूटे हुए दरवाज़ों से भयानक गरीबी झांक रही थी कोने में एक ढिबरी जल रही थी उसकी रौशनी में फटे चीथड़ों में एक बच्चा और उसकी जीर्णकाय मां बैठी थी, मुझे अपने ऊपर गुस्सा आया। भरे हुए पेट के साथ मैं छोटे शहर में आने की वजह से परेशां हूँ और जिन्हे दो दिन से रोटी नहीं मिली उनका क्या। मुझसे और नहीं देखा गया मैंने जेब से ५०० के दो नोट निकले और वहीँ से एक छोटा सा पत्थर लेकर उन्हें लपेट दिया फिर उसको दिवार की फटी झिर्री से अंदर फेंक दिया जोर की आवाज़ से वो पत्थर नोट के साथ खाली कटोरे में गिरा।

मैं तुरंत आगे चल दिया ताकि उस परिवार को ये न लगे की मैं उनकी गरीबी का मजाक उड़ा रहा हूँ. रास्ता मुझे अभी भी नहीं दिख रहा था न ही याद आ रहा था तभी मुझे सामने से एक व्यक्ति लालटेन लिए जाता हुआ दिखाई दिया मैं उसके पीछे चल दिया। वो थोड़ी दूर था लेकिन फिर भी मैं देख सका की उसने ग्रामीण वेशभूषा यानि धोती कुरता पहना हुआ है। उसके पीछे चलते हुए मैं

बड़े रोड के किनारे आ गया था, मेरी जान में जान आयी, मैंने बड़े रास्ते पर आकर उसे देखना चाहा लेकिन वो मुझे दिखाई नहीं दिया। मैं अपने घर पहुँच गया। दूसरे दिन इतवार था और मैंने तय किया की कानपूर जाऊंगा फिल्म देखने के लिए। मुझे रास्ता पूछने की जरुरत नहीं थी क्योंकि ड्राइव कर के मैं कानपूर से आया था। मैंने तय किया शाम का शो देखूंगा और डिनर किसी रेस्ट्वरेण्ट में कर के लौटूंगा। मैं आराम से कानपूर पहुँच गया। हीर पैलेस में फिल्म देखी और क्वालिटी रेस्ट्वरेण्ट में डिनर किया। किसी ने मुझे बताया था की मॉल रोड पर भगवनदास की कुल्फी जरूर खाना तो मैं वो भी खाने पहुँच गया।  आखिर साढ़े ग्यारह बज गए मैं उन्नाव की तरफ चल दिया लेकिन पता चला की छोटा ब्रिज किसी खराबी की वजह से बंद है और मुझे जाजमऊ के रास्ते से जाना पड़ेगा।

मुझे ये रास्ता पता नहीं था लेकि आखिर पूछते ताछते मैं उस रास्ते पर पहुँच गया. मैंने कार उस रास्ते पर बड़ा दी चारों तरफ एक दम स्तब्धता थी और एक भी कार उस सुनसान रास्ते पर नहीं दौड़ रही थी, मुझे अजीब सा लगा क्योंकि उन्नाव की तरफ कानपूर से तो लोग आते जाते रहते हैं। फिर भी मैं चलता रहा, पूनम का चाँद पूरी रौशनी बिखेर रहा था और मैं चलता जा रहा था। काफी देर बाद मुझे लगा की मैं बहुत देर से ड्राइव कर रहा हूँ अब तक तो उन्नाव पहुँच जाना चाहिए था। मैंने घडी देखी रात के दो बज रहे थे यानि दो घंटे से मैं कार चला रहा हूँ जबकि कानपूर से उन्नाव तो एक घंटे का भी रास्ता नहीं है अब मुझे घबराहट होने लगी और थोड़ा

डर भी लगा फिर भी मैंने कार की रफ़्तार और तेज कर दी आधा घंटे से ऊपर गुजर गया लेकिन ये रास्ता ख़त्म ही नहीं हो रहा था। तभी मुझे कुछ दूर पर एक व्यक्ति रोकने का इशारा करते दिखाई दिया मैं इतना घबराया हुआ था की उसके लिए कार रोकने वाला नहीं था लेकिन पास आने पर मैंने देखा ये वही व्यक्ति था जो उस दिन गली में लालटेन लिए चल रहा था। मैंने कार रोक दी। वो सामने की सीट पर आकर बैठ गया -"बोलै भैया मैं उन्नाव जाऊंगा मुझे छोड़ दोगे? मैंने हाँ में सर हिलाया। वो आराम से बैठ गया। बोलै "भैया आराम से चलाओ तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ " मैं अकबकाया सा कार चला रहा था मेरा दिमाग ही काम नहीं कर रहा था।

वो बोला" आज पूनम की रात है और पूनम की रात को जो लोग जानत हैं वे कभौ इस रास्ते पर नहीं चलत हैं। तुहे मालूम है ये खूनी रास्ता है हर पूनम की चाँद को बलि लेता है इंसान की। इसीलिए तो कोई पूनम की रात को नहीं चलत है इस रास्ते पर। और कोई अनजाना ट्रक ड्राइवर या कार ड्राइवर आ भी जाता है तो बस ब्रिज से सूधो खाई में गिर के बलि हो जात है "। मैं पसीने से नहा चुका था। मुझे लग रहा था अब शायद ये रास्ता कभी ख़त्म नहीं होगा और आज मेरी भी बलि चढ़ने वाली है। तभी उस इंसान ने मुझे कार रोकने को कहा "बस यहीं हमें उतर दो वो आगे उन्नाव का मोड़ है सीधे जाकर बाएं मुड़ जाना " मेरी जान में जान आयी।

'बहुत धन्यवाद, वैसे आपको ये कहानी पता थी तो आप इस रास्ते पर कैसे आ गए "

"तुम्हारी जान जो बचानी थी, हमारे परिवार की तुमने मदद करी थी वा दिन। हमारे ट्रक एक्सीडेंट में मरन के बाद भूखे मर रहे थे वे लोग" मैं स्टीयरिंग व्हील पर ही बेहोश हो गया।


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