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kanak lata tiwari

Inspirational


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kanak lata tiwari

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प्यास

प्यास

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सिद्दू अपनी माँ को सिर पर कलश उठाये जाते हुए देख रहा था। उफ कितनी गरमी है फिर भी कड़ी धूप में सिर पर बोझ लिये कितनी दुर चलती है।

उसके गाँव का तालाब तो बरसात न होने के कारण सूख गया। इकलौता कुआँ जो था, उसमे भैसा डूब कर मर गया। तबसे कोई उसके पास नहीं फटकता था। ऐसे भी गंदला पानी ही था उस कुऐंका।

फसल भी सूख गई बारिश के बिना अब सिद्दू को घर भी सूना लगता है बापू तो शहर चला गया मजदूरी करने।

तभी बूढ़ी दादी की आवाज से सिद्दू का ध्यान टूटा। ‘‘बेटा जरा पानी ला दे’’

सिद्दू ने जाकर पानी का घड़ा देखा लेकिन वो तो बिलकुल खाली था।

‘‘दादी घड़ा खाली है। माँ पानी लायेगी तब पीना’’

‘‘अरे तेरी माँ को आने में दो घण्टे लगेंगे, तब तक प्यास से मेरी जान निकल जायेगी। जा जरा पड़ोस में देख ले बेटा’’।

सिद्दू इमरती काकी के घर गया। काकी भी तो माँ के साथ गई है पानी लाने। घर पर काका थे तबियत खराब होने के कारण मजूरी करने नहीं गये। किसी तरह घडे़ से आधा कटोरा पानी निकाल कर सिद्दू को उन्होने दिया। सिद्दू ने जाकर दादी को पिलाया।

‘‘आह अब जान में जान पड़ी, जुग जुग जियो बेटा।’’

‘‘दादी सब लोग इतनी दूर पानी लाने जाते है, गाँव मे दूसरा कुआँ क्यों नहीं खोद लेते।’’

‘‘कौन खोदेगा बेटा, गाँव के आदमी तो सब मजदूरी के लिये श हर गये है’’।

‘‘दादी हम सब बच्चे मिल कर करेंगे’’ दादी हँंसने लगी।

‘‘हँस क्यों रही हो दादी?’’

‘‘ दादी गंभीर हो गई’’ बेटा फावडाए कुदाल का काम है ये और तुम बच्चे न उठा पाओगे इतने भारी औजार।

सिद्दू गंभीर हो गया। दादी ठीक कह रही है लेकिन पानी भी तो चाहिये ही। खुद प्यास लगी है सिद्दू को और उसे दो तीन घंटे इन्तजार करना पडे़गा। जब माँ आयेगी तभी तो पानी मिलेगा।

सिद्दू बाहर बैठ गया। कुछ बच्चे गुल्ली डंडा खेल रहे थे।

‘‘आओ सिद्दू खेलते है’’

‘‘मन नहीं है’’ सिद्दू उदास आवाज में बोला।

‘‘हुआ क्या है?’’ एक बच्चे ने पूछा।

‘‘प्यास लगी है।’’

पूछनेवाले बच्चे का चेहरा भी उतर गया। सचमुच प्यास तो आज इतना बड़ा प्रष्न बन चुकी है, सबके सामने। सूखे पथराते खेत, पौधे प्यास प्यास ही तो चिल्ला रहे है। लेकिन कहाँ से बुझे ये प्यास । कहाँ से आये पानी। बुझे मन से सिद्दू और उसके साथी बैठ गये। सिद्दू ने कहा’’ चलो हम लोग कुआँ खोदंे’’

‘‘पागल हो गया है क्या? ये हमारे बस का नहीं है।’’

फिर पानी कहाँ से आयेगा। पाँच मील जाकर माँ जिस तालाब से पानी लाती है कहीं वो सूख गया तो।

सारे बच्चे माथे पर हाथ रखकर इस भावी विपत्ति के बारे में चिंतन करने लगे।

‘‘एक काम हो सकता है’’ रमुआ ने कहा, जो उम्र में सबसे बड़ा था।

‘‘क्या? ’’ सभी एक साथ बोले। पहले तो हमें पता लगाना चाहिये कि पानी मिलेगा कहाँ, फिर हम बाद मे सोचेगें कि कैसे कुआँ खोदा जायेगा।

‘‘हाँ ये ठीक है। ’’ सिद्दू ने सर हिलाया।

‘‘अपने गाँव के दिनानाथ काका जानते है पानी कहाँ मिलता है। उन्हे उस जमीन की पहचान हैै जहाँ से पानी निकलेगा।’’ रमुआ बोला।

‘‘तुम्हें कैसे पता?’’ सिद्दू ने पूछा।

‘‘वो मेरी अम्मा से कह रहे थे कि इस गाँव में पानी कई जगह है लेकिन उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं देता।’’ रमुआ ने विज्ञ की तरह सर हिलाया।

सिद्दू उत्साहित हो चला। ‘‘चलो हम उनके पास चले। सारे बच्चे दीनानाथ काका के पास पहुँंच गये। काका सारे बच्चों को देखकर काफी खुष हो गये।’’ ये चैकड़ी मेरे यहाँ कैसे?’’

‘‘काका हमें आपकी मदद चाहिये’’ रमुआ बोला ‘‘क्या चाहिये?’’ काका ने थोड़ा उध्दिग्न होकर पूछा।

‘‘काका हमें कुआँ खोदना है।’’ सिद्दू बोला।

‘‘कुआँं खोदोगे तुम लोग’’ काका हँसने लगे फिर गम्भीर हो गये,’’ ये तुम्हारे बस का काम नहीं।’’

‘‘काका हम शुरू करेगें तो बाकी लोग भी आ जायेगें’’ रमुआ बोला।

ठीक है चलो देखे। आगे-आगे दीनानाथ काका और पीछे-पीछे बच्चे चल दिये।

सभी बच्चे नम जमीन की खोज में लग गये क्योंकि काका ने कहा कि अगर पानी नीचे होगा तो जमीन ऊपर से कुछ नम दिखेगी।

लेकिन चटकती पत्थर की तरह सख्त जमीन में पानी का नामोनिशान भी नहीं दिख रहा था।

सारे बच्चे परेशान होकर वापस आ गये। सिद्दू भी खामोशी से माँ के आने का इन्तजार करने लगा। काफी देर बाद माँ आती दिखाई पड़ी। सर पर भारी घड़ा लिये, उसकी कमर दोहरी हुई जा रही थी लेकिन घरवालों की प्यास उसे खींचे ला रही थी।

घर पहुँंच कर बहुत धीरे से उसने पानी के घडे़ को उठाकर स्थान पर रखा। षायद कोई मोतियों का खजाना भी इतनी एहतियात से न रखे जैसे धीरे से सिद्दू की माँ ने पानी रखा।

सिद्दू लपक कर पानी पीने आया। ‘‘धीरे से’’ माँ ने डपटा’’ मैं देती हँू न निकालके’’ बूढ़ी सास और बच्चे को पानी पिलाकर वह रोटी बनाने बैठी। बर्तन तो उसी कुऐं के गंदले पानी से धोने पडे़गे। न जाने कब होगी बारिष, हे ईष्वर गरीबों पर क्या कहर कम है जो ऐसी आपदा तुम ले आये।

जहाँ से वो पानी ला रही थी वो जल प्रपात भी धीरे-धीरे सूख रहा था। क्या होगा जब ये भी सूख जायेगा।

सिद्दू की माँ भय से सिहर उठी। तभी सिद्दू के पिता राम किशोर आते 

दिखाई दिये । हाथ में कुछ था, इसका मतलब मजुरी मिल गई।

राम किशोर ने आकर थैला रखा। ‘‘चावल और सब्जी लाया हूँ। परवल बैंगन, कदू, आलू, टमाटर, सब है। एक सब्जी बना ले। आज भरपेट खाना तो खाने को मिलेगा।

सिद्दू मुस्कुराने लगा। इतने दिन से आधे पेट को किसी तरह रोटी के टुकडो से भरते हुए इन्सान को सब्जी तो किसी ऐष्वर्य की वस्तु ही लगेगी।  राम किशोर ने जेब से एक टाॅफी निकाल कर सिद्दू को दी। सिद्दू आनन्दपुर्वक उसे चुसने लगा। आह कितनी मीठी है, काश उसे रोज मिल पाती। राम किशोर ने हाथ मुँंह धोकर कहा ‘‘जरा चैपाल में टी.वी. देखकर आता हूँँ, समाचार देख लुँगा।’’

विकास की लहर उनके गाँव तक आ चुकी है, चैपाल में टी.वी. के रूप में, उसे चलाने वाली बिजली गायब ही रहती है। लेकिन गाँव वाले भी उसे चला कर ही दम लेते है, वे उसे ट्रैक्टर की बैटरी से चलाते है।

सिद्दू खाने के इन्तजार में उँघने लगा था तभी उत्साहित राम किशोर अन्दर घुसा।

‘‘अरे सुनती हो।’’

‘‘ क्या हुआ’’

सिद्दू की माँं ने पूछा। आज उस का मन आल्हादित था। परिवार को भरपेट खाना खिलाने का सुख गृहिणी ही जान सकती है।

‘अरे सरकार हमारे लिये बाहर गाँव से पानी भेज रही है।’’ राम किशोर बोला।

सिद्दू की माँ का मुँह बन गया ‘‘पानी भेज रही है। क्या पिछली बार के टैंकर की तरह जो आधे लोगो को भी पानी नहीं दे पाया था और उसपर चढ़कर कालु हलवाई की लड़की की टाँग टूटी सो अलग’’।

‘‘नहीं नही इस बार तो ट्रेन से पानी आ रहा है और हजारों गैलन पानी। सारी पानी की समस्या ही हल हो जायेगी।’’

सिद्दू ऊँंघते ऊँंघते चैंक कर उठ बैठा ‘‘क्या बाबा अब अम्मा को इतनी दूर पानी लेने नहीं जाना पडे़गा।

‘‘नहीं रे तेरी अम्मा को घर बैठे पानी मिलेगा।’’ दूसरे दिन सुबह सुबह ही सिद्दू ने और बच्चो की ये खुशखबरी सुनाई, लेकिन हर किसी के घर पर यह खुशखबरी पहुंच चुकी थी।

सिद्दू और सारे बच्चे सुबह-सुबह स्टेषन पहुँच कर ट्रेन का इन्तजार करने लगे। दोपहर चढ़ आई, बच्चो को भूख लगी थी। लेकिन ट्रेन का नामोनिशान नहीं था। आखिर बुझे मन से वे घर जाने के लिये उठे। तभी उन्हे टैंकरो वाली ट्रेन आती दिखाई पडी। ट्रेन आकर स्टेशन पर रुकी। बडे-बडे पाईप लिये लोग टैंकरो से पानी निकाल कर अण्डरग्राउण्ड टैंकरो में भरने लगे।

झर झर बहते पानी को टैंकर से आते देख सिद्दू की आँखे ख़ुशी से भर आई। अब जी भरके पानी मिलेगा ये सरकार बहुत अच्छी है। बाबा को कहकर सरकार को वो टाफी लेकर जरुर देगा। इस विचार से उसका चेहरा ख़ुशी से उद्भासित हो उठा।


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