Kanchan Pandey

Tragedy


4.6  

Kanchan Pandey

Tragedy


वह प्यार–आप नही समझोगे

वह प्यार–आप नही समझोगे

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बहते आंसुओं की बूंदों ने सींचा है उन दर्द को जिससे मैं सदा अनजान रही,अनजान थी उन गुमनाम रास्तों से जिस पर चलना था मुझे लेकिन बहुत हीं खुश होकर चल दी क्योंकि दर्द हीं गुरु है इन गुमनाम रास्तों का प्रत्येक पल कुछ ना कुछ सीखा कर साथ -साथ चलता रहता है। यह सोचते हुए रमा घर से आफिस के लिए निकली कुछ दूर हीं निकली थी कि उसे आज रास्ता बहुत लम्बा लगने लगा अचानक उसके मुँह से निकल पड़ा ओह ! कितना लम्बा रास्ता है खत्म होने का नाम हीं नहीं ले रहा है रोज यही तो कितनी जल्दी खत्म हो जाती है। आज क्यों ना वही रास्ता लम्बा लगेगा उसके साथ जो उसका दर्द चल रहा था और ऐसी खोई कि बसस्टैंड में नहीं रुक कर आगे बढ़ती चली गई। रमा का ध्यान खुला तब क्या करे ना करे लेकिन तभी एक पड़ोसी पप्पू जी उधर से गुजरे भाभी जी छोड़ दूँ रमा नहीं - नहीं भाई साहब चली जाऊँगी

अब तो पांच मिनट का रास्ता है देर तो हो गई थी लेकिन रमा के मेहनती, ईमानदार और अपने काम के प्रति समर्पित होने की भावना के कारण मैनेजर ने भी कुछ नहीं कहा।

शाम को रमा घर पहुंची एक हाथ में फाइल से भरी थैली तो दूसरे हाथ में उसका पर्स घर का एक भी समान जगह पर नहीं था सभी जगह वही किताबें हीं किताबें बिखरी हुई थी। कहीं सोफा कोभर तो कहीं कुसन ओह ! रमा जोर से बोल पड़ी यह क्या है ? रानी, घर की क्या हालत बना कर रखी हो ॠषभ कहाँ गया है ? रानी –खेलने। रमा पूछते पूछते रसोईघर पहुंची रसोईघर जैसा छोड़कर गई थी उसी स्थिती में थी, लेकिन यह क्या ?

रमा जोर से बोल पड़ी,छुटकी –क्या हुआ मम्मा ?रमा –तुमलोगों ने फिर खाना नहीं खाया ? हे भगवान मैं रोज रोज क्यों बनाकर जाती हूँ। रमा का गुस्सा प्यार में परिणत हो गया ओह !मेरे बच्चे सब सुबह से कुछ नहीं खाए हैं खिड़की से बाहर झाँकते हुए देखा ऋषभ खेल रहा था। रमा –छुटकी ‌जा भैया को बुलाकर ला तब तक गरम गरम कुछ बना देती हूँ। एक गिलास पानी पीकर नाश्ता बनाने लगी लेकिन उस गर्म नाश्ते को कोई छूने तक नहीं आया। ऋषभ –अभी माँ भूख नहीं है। रानी -हाँ मम्मी कहा ना नहीं खाना।

रमा –छुटकी तू खाएगी या तेरा भी पेट भरा हुआ है, एक तो दिन भर की परेशानी ऊपर से यह भाई बहन के नखरे ओह ! छुटकी डर से थोड़ा - थोड़ा मुँह में डालने लगी। रमा –घर आते हीं एक गिलास पानी तो कोई देता नहीं है। धीरे - धीरे सभी कमरे में चले गए प्लेट में पड़ा पोहा रमा को और रमा पोहे को देख रही थी और रमा बोल पड़ी तेरी और मेरी स्थिती एक जैसी है कोई उपाय नहीं रहे तब.....बोलते बोलते सोफा ठीक करने लगी तभी जोर से चिल्ला उठी ओ तो यह बात है हमेशा मना करती हूँ यह पाकेट बंद चीज मत खाओ लेकिन नहीं और यह तो घर नहीं होटल है जहाँ खाया वहीं फेंका और एक राजेश हैं जो अभी तक नहीं आएँ हैं।

तभी राजेश भी आफिस से आ गए। राजेश क्या हो रहा है रोज- रोज वही हल्ला घर में, क्या हुआ रमा तुम्हारी आवाज गली की के अंतिम छोड़ तक सुनाई देती है। रमा -क्या करूं इनलोगों को घर को खाना अच्छा नहीं लगता है। राजेश –बच्चे हैं। रमा - और आप। राजेश –मैं, मैंने क्या किया ? रमा –कुछ नहीं, क्या होगा जब जानते हैं कि

मेरा आपके बिना कौन है किससे दो बातें करूंगी आपको पता है क़िस तरह यह समय बितता है इस पर आप जान बुझकर इतना देर से आते हैं। राजेश - मैं जान कर देर नहीं किया लेकिन अगर कोई मिल जाए तो क्या करें बात भी ना करूं। रमा - और मैं किससे बात करूं। राजेश –तुमको कहाँ मना करता हूँ तुम भी जाओ | रमा –कहाँ ? जब मैं नई - नई थी, तब तो एक पल भी साथ नहीं छोड़ते थे और अब ? राजेश –अब क्या कमी है, सभी सुविधाओं से घर भरी हुई हैं। रमा –यह सुविधाएं मुझे नहीं चाहिए,मुझे आपका वही साथ चाहिए जो पहले था,दम घुटता है मेरा,अकेले –अकेले अब एक पल भी नहीं कटता क्या करूं। राजेश – इतना परेशान मत हुआ करो और मुझे भी ....

छोड़ो जाओ चाय बनाकर लाओ।  राजेश चाय पीते हीं फिर अपनी मोबाइल में व्यस्त हो गए और कुछ क्षण पश्चात कहीं निकल गए। रमा अपने काम में व्यस्त हो गई, लेकिन जब उसका काम खत्म हुआ तो सहसा उसकी नजर घड़ी पर गई अरे दो घंटे होने को आए और इनका कुछ पता नहीं वह खुद में बुदबुदाते हुए मोबाइल उठाई लेकिन बार –बार रिंग जाने पर भी बात नहीं हुई। रमा –कहाँ हैं ? आप, एकबार तो फोन उठा लीजिए,अचानक रमा बहुत परेशान हो गई,हद तो तब हुई जब अचानक रिंग के स्थान पर मोबाइल द्वारा स्विच आफ की बातें सुन वह बेचैन हो गई और यह एक दिन की कहानी नहीं रोज -रोज इन्हीं परिस्थिती से गुजरना पड़ता था रमा को शायद उसका प्रेम हीं था जो रोज उसको वही परिस्थिती में हिचकोले करवाता था और वह सहन करती थी उस परिस्थतियों में रोज मरना और राजेश का मुँह देखकर जीवित हो जाना | करीब आधे घंटे के पश्चात डोरवेल बजी छुटकी ने दरवाजा खोला पापा आ गए, बच्चों के चेहरे पर भी एक चमक आ गई। राजेश –रमा - रमा देखो ना,अचानक फोन आ गया और मैं मीटिंग के लिए निकल गया

और तुम्हारा जब फोन आ रहा था तब मैं मीटिंग में था। रमा –इसलिए उसके बाद फोन आफ कर लिए। राजेश –नहीं, तुम तो गलत हीं समझती हो। रमा –हाँ हाँ मैं हीं गलत हूँ। राजेश –मैंने कब कहा,लेकिन मोबाइल डिसचार्ज हो गया था। रमा –एक तो बिना बताए घर से निकल जाते हैं और यह भी नहीं की एकबार फोन हीं करके .....राजेश –रोज -रोज के तुम्हारे इस किचकिच से मेरा बना बनाया काम बिगड़ जाता है चलो बच्चों को खाना दो। रमा ने बच्चों को खाना तो दे दिया लेकिन खुद खाने नहीं बैठी। राजेश –चलो रमा खाना खा लो माफ़ कर दो अब आगे से यह गलती नहीं होगी। रमा –कितनी बार आप माफ़ी मांगेंगे मैं अब तंग आ गई हूँ और मेरे कारण अगर समस्या है तो मैं हीं चली जाऊँगी। राजेश-अरे वह तो गुस्से में मैने बोल दिया।

सुबह होते हीं बच्चों का स्कूल,राजेश का आफिस और इसमें नाश्ता, लंच बाक्स,बच्चों को तैयार करना और साथ खुद भी तैयार होकर आफिस जाना। इस भागा दौड़ी में मन की बातें मन में हीं रह जाती थी,

फिर भी काम से नजरें चुरा कर वह राजेश के पास जाती की दो बातें हो जाए तो दिन भर की शक्ति मिल जाएगी लेकिन राजेश का तब भी लैपटॉप और मोबाइल में व्यस्त रहना रमा को शक्तिहीन बना जाता था,सबको विदा करके रमा भी अपने आँखों में आँसू लिए फिर निकल पड़ती थी, अपनी दिशा की ओर उसके आँसुओं को ना हीं कोई देखने वाला और वह भी किसी को नहीं दिखाना चाहती थी, लेकिन टूटी हुई आस को जोड़ते हुए अपने आपको झूठा दिलासा दिलाती हुई फिर मन को बांधती हुई अरे आज तो शनिवार है आज दोनों सवेरे घर चले आएँगे फिर मन भर बात करूंगी और फिर घर में बहुत समान की कमी हो गई है, बहुत दिन हो गए हैं बाजार साथ नहीं गई हूँ,और आज कुछ अच्छा बनाऊँगी,लेकिन भाग्य की विडम्वना,राजेश के लिए क्या शनिवार और क्या सप्ताह के अतिरिक्त दिन सभी एक समान थे।

आज रमा बहुत खुश थी लेकिन उसे क्या पता उसके भाग्य ने उसके लिए कुछ और विचार किए हुए थे |बेचारी रमा की इच्छा मन में हीं दब कर रह गई। यह कहानी अब तो रोज की थी समय या तो घर के कामों में बितता था या आफिस के कामों में लेकिन मन के कोई कोने में एक तडप थी कि वह शुरू के दिनों की तरह राजेश के साथ वैसे हीं समय बिताना चाहती थी, हर समस्या को साथ –साथ बात करके हल करना चाहती थी लेकिन राजेश की राह हीं अलग हो गई थी,जहाँ राजेश को अपने परिवार को रुपयों के ढेर पर बिठाना था वहीँ रमा को एक दूसरे के साथ प्यार और घुलमिल कर रहना पसंद था और यह प्यार हीं था कि राजेश के देर होने पर या मोबाइल स्विच ऑफ़ होने पर वह बेचैन हो जाती थी और घंटों दरवाजे पर खड़ी रास्ते को निहारती और फिर मोबाइल लगाने लगती और बात नहीं होती तब कभी कभी वह रो पड़ती थी लेकिन इन आंसुओं का कोई गवाह नहीं था और राजेश के आते हीं उसके शरीर में प्राण आ जाते थे लेकिन दरवाजा खुलते हीं,रमा – रमा के कहाँ थे के सवाल से शुरुवात होता और बात बढ़ते-बढ़ते विकराल रूप ले लेती थी।

रमा की भावनाओं को वह समझ नहीं पा रहा था, जो रमा को दुखी कर जाता था, अब तो गुस्से से रमा अगर बोल देती की नहीं खाऊँगी तब राजेश एकबार भी प्यार से मनाने की कोशिश भी नहीं करता था। हाँ यह सच है कि वह भी भूखा सो जाता था।

एक दिन तो हद हो गई रमा बहुत जोर से गिर गई लेकिन राजेश सोफे पर बैठा रहा लेकिन उठकर भी नहीं आया एकबार यह भी नहीं पूछा कि कहाँ चोट लगी है।

रमा को उस चोट से ज्यादा आंतरिक पीड़ा हुई वह सोचने लगी क्या वही राजेश है जो कुछ साल पहले एक खरोच लगने से भी तडप उठते थे,इन सभी बातों से वह कभी-कभी यह सोचती कि मर जाना हीं अच्छा है, जाने अनजाने राहों पर भटकते –भटकते न जाने कहाँ आ गई हूँ, जहाँ ना हीं राह का पता है ना हीं मंजिल नजर आ रही है धुंधली-सी राह दिखती तो निकल पड़ती उन राह पर कहीं भटकते –भटकते शायद मंजिल दिख हीं जाती ठहरी हुई हूँ पानी की तरह कहीं ठहरे –ठहरे सड़ ना जाऊं। नहीं बहाव हीं है ना हीं कटाव हीं है। इस मन रूपी पानी का रंग भी बदलता जा रहा है शायद कोई काम की ना रह जाऊं लेकिन दूसरे पल उसके बच्चों का मुखड़ा उसके सामने घुमने लगता और सोचती इसमें इन बच्चों का क्या दोष मेरे जीवित रहते हुए तो पिता कभी दो मिनट नहीं दे पाते हैं मेरे बाद क्या होगा इन मासूमों का।

कभी कभी वह भी आफिस के बाद घंटों कहीं बाहर बिता देना चाहती थी कि राजेश को भी उसकी कमी का एहसास हो लेकिन बच्चों का ख्याल उसे बेचैन कर देता था। रमा मन हीं मन सोचती एक तो राजेश कब आएँगे और उसकी अनुपस्थिति में बच्चों का क्या होगा।

रमा –मन हीं मन सोचने लगी एकबार राजेश के भरोसे वह बच्चों को छोड़कर आफिस के एक मीटिंग में गई थी लेकिन आने के बाद पता चला कि उसके जाने के कुछ क्षण पश्चात हीं राजेश कहीं निकल गए थे और पूछने पर बताए कि याद हीं नहीं रहा, रमा सब कुछ तो तुम हीं देखती हो।

रमा ने बहुत कोशिश कि लेकिन राजेश में कोई परिवर्तन नहीं आया तब उसके पास कोई उपाय नहीं था।  वह अंततः राजेश से अलग होने का सोच ली लेकिन यह भी रमा के लिए आसान नहीं था वह जिस राजेश से अलग दो घंटे भी नहीं रह सकती थी,वह क्या जिन्दगी भर रह पाएगी,यह बात उसके फैसले को हिला कर रख देती थी ,लेकिन यह कैसा पास था, जो एक साथ घर में रह कर भी कई दिनों तक ठीक ढंग से बातें नहीं हो पाती थी। रमा ने आज घर छोड़ने का दृढ निश्चय कर लिया और अपने बच्चों के साथ निकलने वाली थी कि राजेश ने बांहें पकड़ ली रुक जाओ रमा,मत जाओ, कहाँ जाओगी राजेश के लाख रोकने पर भी वह रमा नहीं रूकी।

राजेश –रमा मत जाओ मैं बदल जाऊंगा

रमा –यह आप बहुत बार बोल चुके हैं। अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता है। मेरा मन क्या चाहता है आप नहीं समझेंगे,वह प्यार आप नहीं समझेंगे।

राजेश –क्या बर्दाश्त नहीं होता है ?

रमा –आप नहीं समझेंगे।

राजेश –क्या नहीं समझूँगा ? सब कुछ तो है तुम्हारे पास और मैं यह जो भी कर रहा हूँ तुमलोगों के लिए हीं तो कर रहा हूँ।

रमा –नहीं मुझे यह सब नहीं चाहिए तुम जितना अपनी जॉब से कमाते हो वही काफी है। किस तरह इस सफर की शुरुवात की थी ना हीं सोची ना हीं समझी चलती चली गई। आज अचानक जब अपने –आप को देखती हूँ तब सन रह जाती हूँ कि जैसे मेरा सफर रूक –सा गया है, तुम्हारे चलने की धुन में मैं बहुत पीछे छूट गई हूँ। मुझे लगा मैं सबके साथ हूँ लेकिन किसी को भी मेरे साथ चलना मंजूर नहीं हुआ। इस घर में सब अपनी मर्जी के मालिक बन अपनी अपनी राह पकड़ ली है। जब कोई नहींं तब मैं जब सारी दुनिया-दारी सीख ली, तब मेरी साथ मेरे भावनाओं की कोई कद्र नहीं है। कोई बात नहीं मनुष्य अकेले जन्म लेता है और अकेले मरता है फिर इस दुनियाँ में क्यों किसी के साथ की जरूरत। अकेला चलना मुश्किल या नामुमकिन तो नहीं।

राजेश –इस दुनियाँ में अगर रुपया है तब तुम मनुष्य हो नहीं तो कोई गिनती नहीं है।

रमा –देखा तुम तुरंत क्या बोले,देखो अपने बात पर दो मिनट भी नहीं टिक पाए।

राजेश –हाँ हाँ नहीं टिक पाया लेकिन मैं तुमलोगों को जाने नहीं दूँगा लोग क्या कहेंगे देखो पत्नी छोड़कर चली गई|


रमा –वाह !लोगों की खातिर मुझे जाने नहीं दिया जाएगा।

राजेश- ऐसी बात नहीं है।

रमा - फिर कैसी बात है मुझे बताओ तुम्हारी बातों से तो यह बात स्पष्ट हो रही है।

रमा ने फिर एक त्याग किया लेकिन उसका मन अंदर हीं अंदर दबा जा रहा था वह रह - रह कर बेचैन हो उठती थी लेकिन परिवार के सम्मान के लिए वह रुक गई लेकिन कुछ महीनों के बाद उसके अंदर के घुटन और पति के साथ की तडप ने उसके प्राण ले लिए। राजेश आज रमा के गुजरने के दस साल बाद भी रमा की कही उस बात को याद करके अपनी आंसू रोक नहीं पाता है,रमा कहती थी जिस प्रकार आपके लिए मैं तड़पती हूँ वैसे आपको भी मेरे बिना अकेले रहना पड़ेगा और अकेलेपन की घुटन कैसी होती है सहना पड़ेगा। आज राजेश के पास सब कुछ है नहीं है तो वह हमसफर जिसे रूपये कमाने की दीवानगी में राजेश ने खो दी थी।


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