Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.
Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.

Kanchan Pandey

Tragedy


4.0  

Kanchan Pandey

Tragedy


संध्या का दीपक

संध्या का दीपक

9 mins 295 9 mins 295

चारों ओर दीपों की माला सजी हुई थी लेकिन संध्या अपनी दुख में खोई अपनी मन के अंधियारे में एक कोने में बैठी पटाखे की आवाज़ को भी नही सुनना पसंद कर पा रही थी, क्योंकि आज का हीं वो दिन था जब संध्या अपने दीपक से जुदा हो गई थी दोनों का प्रेम विवाह होने के कारण घर के सभी सदस्य हमेशा रुखड़ा व्यवहार करते थे जो दीपक अपनी माँ का दुलारा और पिता के आँखों का तारा था बहनों का राजा भैया आज अचानक पराया हो गया था।  कोई ठीक से बातें भी नही करता था नौकरी नही होने के कारण अपनी और संध्या की जरूरत को पूरा करने के लिए जब भी माँ को कहता तो माँ कह बैठती, इसलिए मैं कहती थी पहले नौकरी कर लो फिर शादी की सोचना लेकिन प्रेम का भूत तुम्हारे सिर पर नाच रहा था। बहनों के तानों ने अब जीना बहुत कठिन कर दिया था। बड़ी बहन कहती अगर आज मैं बेटा होती तो कभी अपने माँ –बाप के इज़्ज़त पर दाग नही लगने देती। 

दीपक –बस करो दीदी मैने शादी करके कोई गुनाह नही किया हूँ।

गुड़िया – सुन रही हो माँ आपका लाडला अब जवाब देना सीख गया है।

दीपक –क्या गलत कर रहा हूँ एक शादी न की कि कोई गुनाह कर दिया खाने भी नही देती हो।

गुड़िया –मैं खाने नही देती कि अपने भोग का तुम खुद जिम्मेदार हो, ठीक है हमलोग दीपावली के लिए आए थे लेकिन अब लगता है हमलोगों का आना तुम को और तुम्हारी पत्नी को नही अच्छा लगा।

दीपक-देखो दीदी संध्या को बीच में मत लाओ।

गुड़िया –क्यों न लाऊं उसके आने पर तुम बदल गए।

दीपक - सही कहा आपने संध्या के आने से यह समस्या उत्पन्न हुई है यह कहकर वह अपने कमरे में चला गया।

गुड़िया –जा जा। दीपक अपने कमरे में आकर संध्या संध्या चिल्लाया। संध्या उस समय रसोई घर में दीपावली के लिए गुजिया बना रही थी वह भाई बहन की बातें सुन रही थी अपने मन को शांत करते हुए पहुंची क्या बात है दीपक क्या हुआ ? देखो संध्या आज मैं तुमसे जो कह रहा हूँ ध्यान से सुनो तुम अपनी माँ के यहाँ चली जाओ मुझे माफ़ कर दो मैं जिस शान के साथ तुम्हें लाया था कि मेरा परिवार जिस प्रकार मुझे प्यार करता है उसी प्रकार तुम्हें भी....... दीपक की बात अभी पूरी भी नही हुई थी कि संध्या ने कहा रुकिए मैं अभी आई गुजिया कढ़ाई में है जल जाएगी। दीपक – तुम भी मत सुनो मेरी बात जोर से हाथ इस तरह चलाया कि गिलास में लगकर गिलास टूट गई और उसके हाथ भी कट गए लेकिन आज दीपक को बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि आज किसी को भी उसकी परवाह नही थी उस टूटे गिलास के सामने वह मंद मंद मुस्कान के साथ निहारता रहा उन अपनों को जो बदल चुके थे वह रात में खाया भी नही ,संध्या ने घाव में पट्टी बांधी और कसम देकर दूध का गिलास हाथ में पकड़ा दी दीपक फफ़क फफ़क कर रोने लगा और संध्या से बोला तुम मायके चले जाओ मैं तुम्हें दुःख के सिवाय कुछ नही दे पाऊंगा। संध्या आँसू को पोछते हुए बोली आपके साथ कहीं भी रहूँगी मैं आपके बिना जीने की कल्पना नही कर सकती हूँ। क्या आप चाहते हैं कि मर जाऊँ।

दीपक – नही नही कभी नही।

दूसरे दिन सभी दीपावली की तैयारी में लगे थे लेकिन दीपक और संध्या से कोई बात नही कर रहा था दीपक के बार - बार टोकने पर भी कोई जवाब नही मिल रहा था दीपक के यह पूछने पर कि जीजाजी नही आएँगे तो नंदा दीदी को यह कहते देर न लगी थी कि अपने माँ बाप का लाडला नालायक नही होते हैं अपने माँ बाप के कहे अनुसार चलते हैं।

दीपक –दीदी क्या कह रही हो तुम मैं ......तभी माँ बीच में आकर दो बात दीपक को हीं सुना दी बहुत बतमीज हो गए हो दो दिन के लिए बहनें आई हैं और देखा नही जा रहा है चलो पूजा करते हैं, लेकिन दीपक अपने घर को तो दीपकों से सजा दिया था लेकिन उन दीपकों से निकलते हुए न जाने अंधेरे में खो गया, संध्या एकटक देखती रह गई माँ ने भी दीपक दीपक रुक जाओ पूजा हो रही है लेकिन रत्ना दीदी ने झट से कह दिया आ जाएगा क्यों इतना परेशान होती हो सभी तो खाना खा कर सो गए, लेकिन माँ और पत्नी का हृदय रात भर इंतजार में गुजार दिया, सुबह हो चुकी थी दीपक नही लौटा माँ रो रही थी दीपक के पापा भी अब व्याकुल दिख रहे थे, बात धीरे धीरे फैलने लगी संध्या के पापा मम्मी भी आए पूरे शहर की खाक छान ली लेकिन दीपक नही मिला। 


कदम जी [संध्या के पापा] ने दीपक के पापा से कहा अब तो पुलिस हीं कुछ कर सकता है चलिए समधी जी इससे पहले कुछ अनुचित न हो जाए, गुड़िया हाँ हाँ जाइए अपनी बेटी को पुलिस के हवाले कर दीजिए सब कुछ की जड़ यही है, पिता ने जोर से डाँटते हुए कहा चुप हो जाओ गुड़िया। गुड़िया का मन में तो अब डर ने घर कर लिया था कि यह लोग अगर पुलिस के पास जाएँगे तो मैं न फँस जाऊँ आखिर मेरी ही लड़ाई हुई थी, अंदर माँ के पास जाकर बोली देखो माँ मानती हूँ मुझे यूँ शादी कर लेना मंजूर नही था लेकिन मैं यह भी पसंद नही करूंगी कि कोई मेरे भाई के लिए यह बोले कि वह मर गया होगा यह सुनते ही माँ तिलमिला गई और बाहर आकर बोली देखिए समधी जी आप अपने घर जाएं।

देखते देखते बहुत दिन बीत गए सभी बेटियाँ अपने अपने घर चली गई संध्या दिन भर अपने कमरे में बैठी रहती न कभी खाती न कुछ पीती सासु माँ की परेशानी बढ़ने लगी उन्हें डर था कि अगर कुछ हो जाएगा तब क्या होगा।

कभी कभी उन्हें क्रोध भी आ जाता ,हीरा [काम करने वाली ] को बिठा देती और दीपक के पापा के साथ दीपक को ढूंढने निकल जाती कितनी बार अख़बार में खबर भी छपाई लेकिन परिणाम कुछ नही निकला, हीरा ही संध्या को संभालती हुई थी खाना –पीना भी वही देखती थी, एक दिन गुड़िया फिर आ गई घर की यह हालत देखकर बोली, माँ यह ड्रामा कब तक चलेगा जब तुम्हारा बेटा ही नही है तो इसको क्यों पाल रही हो भेज दो इसे जरूरत नही है इसकी हम तीन बहने हीं अपने माँ बाप के लिए काफी हैं इस बात पर पिता ने डांटा भी था लेकिन बेटी की मर्जी के आगे पति की एक न सुनी संध्या के माता पिता को बुलाकर संध्या को भेज दिया गया। गुड़िया बोली देखो माँ उसके जाते ही घर पवित्र हो गया पिता ने कहा गुड़िया तुमने तो मेरे दीपक की निशानी को भी नही रहने दिया। गुड़िया हीरा को बुला कर अपने पैरों में तेल लगवाई और बोली देख हीरा खाना तो तू बनाती ही है लेकिन मेरे जाने के बाद पापा मम्मी की देखभाल अच्छे से करना समझी। हीरा –जी, हीरा डरते डरते बीबी जी एक बात कहूँ, गुड़िया क्या, हीरा - आपने अच्छा नही किया।

गुड़िया –भड़क गई तू मुझे सिखाएगी तू भी जा तेरी कोई जरूरत नही है और हीरा को चार बात सुनाकर निकाल दी और बोली माँ चिंता मत करना मैं हूँ। उधर संध्या मायके जाकर भी खुश नही थी किसी से बातें भी नही करती थी गुड़िया कुछ दिन रहने के बाद अपने ससुराल चली गई अब तो रोज रोज माया [दीपक की माँ ]और राधेराम जी का समय अपने बेटे को खोजने में निकल जाता था, कभी इस अख़बार तो कभी उस अख़बार में लापता होने की खबर छपवाते रहते थे कभी कभी कोई बेटियों के आ जाने से घर में रौनक बढ़ जाती थी लेकिन माया की आँखों का खालीपन साफ झलकता था। इस बार बहुत दिन हो गए लेकिन कोई बेटी नही आई माया की तबियत भी खराब हो गई थी, एक दिन एक एक करके तीनों बेटियों को फोन लगाई लेकिन तीनों ने अपना काम बता कर बात टाल गई, माया रोने लगी और उन दिनों को याद करने लगी जब संध्या और दीपक थे और वह बीमार हुई थी कितनी सेवा की थी। संध्या ने रात भर जगकर सेवा की थी वह अचानक उठी और राधेराम जी को सिर्फ़ इतना बोली चलिए मेरे साथ और संध्या के पास पहुंच कर उसके गले से लिपट कर रोने लगी, माफ़ कर दो बहू चलो अपने घर। कदम जी उनकी कष्ट को देखकर रोक नही सके सिर्फ यह बोले कि अब यह तो जिन्दा लाश है सास अपनी बहू को लेकर चली गई, अब तो संध्या को देखकर माया का भी दुःख दूर होने लगा अब वह भी हमेशा अपनी बहू के साथ मग्न रहती थी एक दिन राधेराम जी को एक विचार आया की क्यों न इस बार संध्या के हालत से संबंधित खबर अख़बार में दिया जाय हो सकता कि दीपक लौट आए, यह सोचकर उन्होंने अखबार में यही खबर छपवाई लेकिन कोई परिणाम नही निकला अब यह अंतिम प्रयास भी विफल हुई, संध्या की हालत दिन प्रति दिन खराब ही होती जा रही थी समय बीतता जा रहा था न जाने कितनी होली दशहरा और दीपावली बीत गए, फिर वही दीपावली का त्यौहार आने वाला था राधेराम जी ने तो कह दिया कि इस बार दीपावली नही मनाया जाएगा संध्या को बर्दाश्त नही हो पाता है लेकिन माया ने कड़े शब्दों में कह दिया की नही घर में दीपावली मनाई जाएगी कब तक मेरी बहू इस अंधेरे में घूटती रहेगी यह ज्योति पर्व हीं मेरी बहू के जीवन में उजाला लाएगा। राधेराम जी ने कहा देखो जो भी करोगी सोच समझ कर करना संध्या की तबियत खराब नही हो जाए इस बार कुछ होगा तो मैं माफ़ नही करूँगा, माया सारी तैयारी शुरू कर दी सारी तैयारी उसी तरह से कि संध्या को भी नई साड़ी पहनाई श्रृंगार कर दी नई दुल्हन की तरह सजा कर पूजा घर ले गई, लेकिन संध्या ने जैसे ही उन दीपक की रौशनी को देखी की अपने आँखों को बंद कर लिया वह उस दीपक को बर्दाश्त नही कर पा रही थी, माया ने उसके चेहरे पर से उसके हाथों को हटाया ही था कि वह दीपों के बीच से एक परछाईं को देखकर जोर से चिल्लाई, दीपक मुझे छोड़कर मत जाओ मैं तुम्हारे बिना नही जी पाऊँगी दीपक दीपक माया ने पलट कर देखा तो वह जाती हुई परछाईं नही दीपकों के बीच से उन प्रकाश को चिरता हुआ माया का लाल और संध्या का दीपक सामने खड़ा था, माया बेटे के गले से लिपट कर रोने लगी कहाँ -कहाँ चले गए थे मेरे लाल देखो अपनी संध्या को। इस दीपक के बिना इन दीपों की लड़ी से इस घर में उजाला नही हो सकता आज भगवान ने माँ के विश्वास की लाज रख ली उसके बाद सभी मिलकर दीपावली की पूजा की, दीपक के आ जाने से अंधेरा मिट चुका था अब संध्या की कालिमा दीपक के प्रकाश के कारण प्रकाशमय हो गया था, इस ज्योति पर्व ने नया जीवन प्रदान किया था और फिर दोनों ने माँ और पिता जी के चरण को छू कर आशीर्वाद लिए ,माँ ने कहा अब संध्या के जीवन में दीपक बनकर चमकते रहना सदा खुश रहो।



Rate this content
Log in

More hindi story from Kanchan Pandey

Similar hindi story from Tragedy