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Meera Jain

Abstract

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Meera Jain

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उपवास

उपवास

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समीर ने घर मे कदम रखते ही सामने अक्षय को देख प्रश्न किया-

'क्या बात है बेटा ! आज तुम खेलने नहीं गये तबियत तो ठीक है ?'

उत्साहित स्वर मे अक्षय ने जवाब दिया-

'पापा ! आज मम्मी के साथ मैने भी निराहार उपवास किया है अब उनके साथ पूजा भी करूंगा '

'क्या--- ' अवाक समीर का उत्तेजित स्वर उभरा-

'नीना ! ये क्या तमाशा है अक्षय से भी उपवास करवा लिया इस धर्म कर्म को अपने तक ही सीमित रखो बच्चों के पीछे नहीं पड़ो समझी '

नीना ने सफाई पेश की-

'समीर ! अब अक्षय कोई छोटा बच्चा नहीं पूरे चौदह वर्ष का हो चुका है और उसने स्वेच्छा से उपवास किया है और इसमे बुराई क्या है तनऔर मन के साथ

श्रेष्ठ समाज का निर्माण भी समाहित है '

समीर ने खीझते हुए पूछा-

'अब तक मैने सुना था उपवास से तन स्वस्थ व आत्मा पवित्र होती है ये समाज बीच कहाँ से आ गया ?'

नीना ने गंभीरता पूर्वक धीमे से कहा-

'समीर ! बात दरअसल ये है मै चाहती हूँ अक्षय को ये भी ज्ञात हो कि भूख क्या होती है भूख का महत्व उसे मालूम होना ही चाहिये ताकि बड़ा होकर दीन- हीन , निर्धन व्यक्तियों के प्रति इसके मन मे सहिष्णुता एवं उदारता के भाव हो भूखों को भोजन करानेकी लालसा इसके मन मे जागृत रहे कुछ नहीं तो किसी जरूरतमंद को

हेय दृष्टि से तो नहीं देखेगा ये भी संस्कारों की अनमोल कड़ी है जो स्वस्थ समाज के लिये अति आवश्यक है '

उपवास के इस नये रूप ने समाज सेवी समीर को भाव विभोर कर दिया।


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