Niranjan Kumar Munna

Romance Inspirational


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Niranjan Kumar Munna

Romance Inspirational


त्याग

त्याग

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पंडित जी बड़े ही धर्मज्ञ और सहनशील प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनके मन में कभी भी किसी के लिए कोई क्लेश या बैर नहीं रहता। जो भी आता प्रसन्न होकर ही उनको द्वार से जाता था। वो सारे प्राणियों में ईश्वर का निवास स्थान मानते थे।

सुबह सूर्योदय से पहले ही उठ जाते और अपनी पत्नी सुभांगी को भी उठा देते। पत्नी जब उठती, तो सबसे पहले झाड़ू लेकर सारे घर में झाड़ू लगाना शुरू कर देती।

सुभांगी के यही काम प्रतिदिन की थी। सुबह-सुबह उठ जाना, प्रातकाली गाना, घर में झाड़ू लगाना, पंडित जी नित्यकर्म से निवृत हो, उससे पहले स्वयं स्नानादि से निवृत हो पूजा की थाली तैयार करना।

पूजा - अर्चना के बाद पंडित जी कुछ जलपान करते और यजमान के गॉव की ओर निकल जाते। दिन भर घूमने के बाद, शाम होते ही अपने घर पहुंच जाते। जो भी यजमनका में मिलता, संतोष से उसी में अपना जीवन यापन करते।

इसी प्रकार पंडित जी का दिन कटते जा रहा था। परम संतोषी पंडित जी का अपने जीवन से कोई विशेष शिकायत नहीं थी।

अगर कुछ था भी तो एक संतान की कमी। पंडित जी की इच्छा थी कि ईश्वर जो दिया सो सही हीं दिया, लेकिन एक पुत्र रत्न प्राप्त हो जाता तो मोक्ष प्राप्ति का रास्ता खुल जाता। ऐसे पंडित जी पुत्र प्राप्ति की तो इच्छा रखते थे, लेकिन वो क्या करें उनके हाथों में तो कुछ था नहीं। जब ईश्वर की कृपा होगी तो होगी।

इधर पंडित जी की पत्नी सुभांगी की भी यही कामना थी, एक संतान ईश्वर दे देते। परंतु चाहने या न चाहने से क्या होगा, जो विधाता ने लिख दिया उसको तो बदल पाना न पंडित जी के लिए संभव था और नहीं सुभांगी के लिए। यही सोचकर दोनों शांत रहते।

समय बितते जा रहा था और समय के साथ-साथ उम्र भी निकलती जा रही थी। समय बितने के साथ मनुष्य की सोच भी बदल जाती है। अब सुभांगी को संतान मोह अंदर ही अंदर और जकड़ ली। संतान प्राप्ति के लिए बहुत से उपाय दोनों ने किये, लेकिन परिणाम शुन्य ही निकला। शहर के डॉक्टर से लेकर तंत्र - मंत्र वाले बाबाओं तक को नहीं छोड़े। जिसने जहाँ बताया, वहां संतान प्राप्ति के लिए दौड़े चले गये। अंत में शहर के नजदीकी डॉक्टर ने पंडित जी को बताया कि आपको संतान इसलिए नहीं हो सकता, क्योंकि आपकी पत्नी में ही समस्या है।

शुरू - शुरू में डॉक्टर के द्वारा कही गई बात को पंडित जी अपनी पत्नी से छुपाते रहे, परंतु कब तक छुपाते! एक दिन सुभांगी को इस बात का पता चल ही गया। उसे मन में दुःख तो हुई, परंतु वो अपनी दुःख को पंडित जी के सामने कभी नहीं प्रकट की। सुभांगी को इस बात की अच्छी तरह जानकारी थी कि पंडित जी मुझे दुःखी देखना नहीं चाहते, इसीलिए सच्चाई को मुझसे छुपाते रहे।

मनुष्य भले ही अपनी वेदना किसी को सामने प्रकट नहीं करे, लेकिन उसके चेहरे पर कहीं न कहीं ह्रदय में छुपी हुई वेदना प्रकट हो ही जाती है। पंडित जी तो पहले-पहल अपने संतान की चाहत को लेकर इतना विचलित नहीं थे, परंतु उम्र के बढ़ते पड़ाव पर संतान की इच्छा और बलवती होती जा रही थी।

इच्छा सारे दुखों की जननी है, यह बात पंडित जी भी बहुत अच्छी तरह से जानते थे। अपनी इच्छा पर अंकुश लगाने के लिए, पंडित जी पूजा-पाठ में अब ज्यादा ध्यान लगाना शुरू कर दिये। सप्ताह में एक दिन उपवास रहना, कथा वाचन करना, देर रात तक यजमान के पास रहना अब उनकी दिनचर्या हो गई थी।

पंडित जी की यह स्थिति पत्नी सुभांगी से देखी नहीं जाती, वो पत्नी थी। पत्नी में यह विशेषता होती है कि वो पति के मन में क्या चल रहा है बड़ी ही सुगमता से जान लेती है। 

सुभांगी को यह बात अच्छी तरह ज्ञात थी कि पंडित जी निसंतान होने का बोझ, मन में ढोह रहे हैं, तो क्यो न इनके परेशानी को दूर करने के लिए, इन्हें दूसरा विवाह करवा दूं...। 


 यह परेशानी और अपनी मन की बात, एक दिन सुभांगी अपनी स्कूल समय में रह चुकी सहेली ज्योति को फोन पर बताई। ज्योति, सुभांगी को बहुत ही विश्वास पात्र सहेली रह चुकी थी।चाहे वो स्कूल में हुड़दंग करना हो या सेठ जी की बगिया से बैर तोड़ कर लाना हो, सुभांगी और ज्योति दोनों साथ रहा करते थे ।

सुभांगी जब हाई स्कूल में पढ़ती थी, तो उसे प्रदीप नाम का लड़का से प्रेम हो गई थी। जब प्रदीप और सुभांगी एक दूजे के साथ जीने - मरने के कस्में खा रहे थे , तो ज्योति भी साथ थी। दोनों के प्रेम को परवान तक पहुंचाने में ज्योति की मुख्य भूमिका थी। चिट्ठी का आदान - प्रदान हो या दोनों को अकेले में मुलाकात करने की योजना, ज्योति के बीना संभव नहीं थी।

शारीरिक आकर्षण से शुरू हुआ प्रेम, कब शारीरिक रिश्ते में बदल गया, ये ज्योति को पता हीं नहीं चली। प्रदीप और सुभांगी का प्रेम, प्रेम की पवित्रता को तोड़ते हुए, वासना के खेल तक पहुंच गई। 


और... 

और उसका परिणाम यह हुआ कि सुभांगी गर्भवती हो गई। सुभांगी तो प्रदीप के बाहों में जाकर इस तरह खो जाती थी,जैसे मानो, अब इस संसार में प्रदीप ही सबकुछ है। लेकिन उस समय सुभांगी को 'तोते उड़ गये ' जब एका - एक उसके 'पाँव भारी' होने के एहसास हुई। 

सुभांगी घबरा सी गई, वो भागती हुई ज्योति के पास पहुंची।

ज्योति जब सुभांगी की बात सुनी तो बहुत उल्टा-सीधा बोली। लेकिन अब किया क्या जा सकता था। 'अब पछताये क्या करें, जब चिड़िया चूग गई खेत। '


सुभांगी बहुत डरी हुई थी। प्रदीप भी किसी प्रकार से मदद के लिए तैयार नहीं हो रहा था। शादी करने की बात हीं छोड़ दीजिए। वो साफ इंकार करते हुए सुभांगी से बोल दिया, - " मैं यह सब नहीं जानता। मज़े लेने में तू सबसे आगे थी और रही बात यह पेट की, तो क्या पता यह मेरी हीं है। तुम्हारा तो बहुतों के साथ चक्कर था, दोबारा मिलने की कोशिश भी न करना मुझसे समझी..।"

उसको बाद प्रदीप कभी भी सुभांगी से नहीं मिला। वह गॉव छोड़कर शहर भाग गया। उसके मामा बड़े ही उच्चे अधिकारी थे। वह शहर अपने मामा के पास चला गया। 

अब सुभांगी क्या करती। माँ - बाप सुनते तो जीते जी मर जाते।

जब कोई रास्ता नहीं सुभांगी को दिखाई देने लगी, तो वह आत्महत्या करने की विचार मन में लाना शुरू की, लेकिन मौत को गले लगाने से पहले अपनी राज़दार और वफादार सहेली ज्योति से मिलना उचित समझी।

ज्योति सहायता करने के लिए तैयार हो गई, लेकिन दो - तीन दिन का समय मांगी। 

जो जैसा रहता है उसका दोस्त भी वैसा ही होता है। ज्योति का भी एक लड़का से प्रेम प्रसंग चल रहा था, लेकिन कभी वो खुलकर सुभांगी से अपने प्रेम के बारे में बातें नहीं की थी। 

वो लड़का कोई और नहीं पंडित जी ही थे। पंडित जी का नम जयंत था और वो ज्योति से अटूट प्रेम करते थे और ज्योति भी जयंत पंडित से प्यार करती थी।

सुभांगी भी पंडित घराना से ही थी। कोई समस्या विवाह में उत्पन्न नहीं होती, लेकिन एक समस्या थी, जयंत और सुभांगी के परिवार को आपस में नहीं बनता था। बहुत ही पुरानी रंजिश चली आ रही थी। दोनों परिवार विवाह करने के लिए किसी भी रूप में तैयार नहीं होते।

तब एक ही रास्ता था। वो रास्ता बड़ा ही टेढ़ा था। ज्योति अपनी सहेली को मान - सम्मान बचाने के लिए अपने प्यार को त्याग करने के लिए संकल्प ले ली। ज्योति को पता थी कि मेरी बात को जयंत किसी भी रूप में टाल नहीं सकता। उसे अपना प्रेम पर संपूर्ण भरोसा थी।

ज्योति, जयंत से मिली और बड़े ही प्यार भरे नजरों से देखते हुए बोली, - "जयंत तू मुझसे बहुत प्यार करते हो न?"

जयंत बड़ी ही विचित्र नज़रों से देखते हुए बोला था, - " तुम्हारे जैसा सा पागल मैंने कहीं नही देखा। क्या कोई शक है! बोलों..।"

"नहीं यार। बश यूं ही।"

"तो।"

"एक काम करोगे मेरे लिए।" - ज्योति बोल पड़ी थी।

"हाँ बोलो।" - जयंत ने मुस्कुराते हुए बोला था।

" तू सुभांगी से विवाह कर ले।"

"क्या।" - जयंत पंडित चौकते हुए बोले थे।

"दोखो, मैं ठहरी बड़े घर की और तू ठहरा...। "

" बस भी करो, हो गया! मैं समझ गया तू कहना क्या चाहती है। तू ये सब सोची भी कैसे हो बताओ न। ये बड़ा - छोटा क्या होता है। लेकिन कोई बात नहीं, मैं तुमसे प्यार किया हूँ ज्योति। तुम्हारी इच्छा अवश्य पुरा करुंगा।"

"तू मुझे गलत समझ रहे हो जयंत, मैं तुम्हारे सिवा किसी और को हो ही नहीं सकती। क्या लगता है कि मैं तुमसे प्रेम नहीं करती? मैं आजीवन कुवांरी रह जाउंगी, लेकिन किसी और से विवाह ही नहीं करुंगी, इस समय सुभांगी मेरे लिए जरूरी है, न कि मेरा प्यार। यार उसने बहुत बड़ी चीज खोई है, तू उसे अपना ले। दोनों भागकर शादी कर ले, बाद में जो होगा सो देखा जायेगा। "


"धन्य हो ज्योति तू अपनी सहेली के लिए इतना कुछ कर सकती हो, मैं तेरे लिए क्यों नहीं। अलविदा माई लव! "-जयंत लबों पर हँसी, लेकिन दिल में दर्द लिए हुए बोला था। और इधर सुभांगी के पास भी कोई विकल्प नहीं थी। स्वयं को कलंक से बचाने के लिए वो ज्योति का कहा मान ली। 


न चाहते हुए भी... 


सुभांगी और जयंत दोनो भागकर एक मंदिर में विवाह कर लिये। जैसे ही सुभांगी को घरवालों को पता चला, उन्होंने जयंत पर मुकदमा कर दिया। मुकदमा होते ही जयंत को जेल हो गया। फिर किसी प्रकार सुभांगी और जयंत के परिवार में सुलह तो हुआ, लेकिन तब तक सुभांगी बहुत बड़ी चीज खो दी थी। अधिक तनाव में रहने, न खाने पीने, हमेशा रोते रहने के कारण गर्भपात हो गया। 


उसके बाद.. 

आजतक वह माँ नहीं बन पाई। कई वर्षों के बाद अब सुभांगी फैसला ले चुकी है, पंडित जी को दूसरी शादी कराने की। पंडित जी को वास्तविक हक दिलाने की। उसे पुनः पंडित जी के जीवन में लाने की। जो पंडित जयंत से अटूट प्रेम करती थी। 

वो आज भी कुंवारी है, आज भी जयंत पंडित को ह्रदय में बसाये बैठी है। एक ऐसी सहेली जो अपने आप में त्याग की मूर्ति है। 


  

             


                   



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