अणु
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अगले दिन तड़के, जब सूरज की किरणें अभी धरती की देह पर धीरे-धीरे फैल रही थीं, रसोई से आती चूल्हे की हल्की खटर-पटर के बीच ही कमला देवी ने अपने सुप्त महाराज को आदेशानात्मक मधुरता में जगाया—
"चुन्नी की सहेली का जन्म दिन है। आज शाम को गाड़ी से कहीं नहीं जाइएगा। ऐसे भी कोई काम तो है नहीं… छुट्टियों में घर में ही रहना है।"
वाक्य सरल था, आवाज मधुर थी, पर स्वर में वह अदृश्य ‘निर्णय’ छिपा था, जिसे सुनकर सत्यार्थ बाबू का दिमाग एक पल को ठनक उठा।
जैसे किसी ने भीतर बैठी थकान पर अचानक चाबुक मार दिया हो।
वो तुरंत कुछ बोल सकते थे—मन तो यही कह रहा था—
“आज तो मेरा सफर का प्रोग्राम है, दोपहर तक निकलना ही है…”
परंतु उन्होंने स्वयं को रोक लिया।
शायद इसीलिए कि पिछले कई वर्षों में उन्होंने समझ लिया था—
घर की शांति और घर की राजनीति के बीच जीत हमेशा राजनीति की होती है।
वे चुप रहे।
कमला देवी अपनी आदत के अनुसार बात कहकर पलटा भी नहीं , बस रसोई की तरफ बढ़ गईं—जैसे आदेश सुना देने के बाद उनका दायित्व पूरा हो गया हो।
सत्यार्थ बाबू कुछ देर तक छत को घूरते रहे।
फिर धीमे कदमों से उठे और बरामदे की ओर बढ़े।
आज उनकी यात्रा लगभग रद्द ही मानिए—
वे भीतर तक समझ चुके थे कि घर में ‘ना’ कहने का विकल्प भी कभी-कभी सिर्फ किताबों में होता है, वास्तविक जीवन में नहीं।
बरामदे में कदम रखते ही सुबह की ठंडी पुरवई हवा उनकी देह से टकराई।
धूल भरे झोंकों ने जैसे मन का बोझ हल्का किया।
सड़क की तरफ नजरें दौड़ाईं—
कल की अपेक्षा शहर आज अजीब-सा शांत था।
रविवार की सुस्त साँसें मानो पूरे मोहल्ले में फैली हुई थीं।
बंगले के बाहर फूलों की क्यारियाँ हल्की हवा में झूम रही थीं।
धूप की गुनगुनी किरणें उन पर ऐसे बरस रही थीं जैसे किसी पुजारी ने फूलों पर आशीर्वाद की लहरी बिखेर दी हो।
सत्यार्थ बाबू सीढ़ियाँ उतरकर क्यारी की ओर बढ़े।
हाथ पीछे बांधे हुए, धीमे कदमों से चलते हुए वे फूलों को निहारने लगे।
दिल strangely शांत था…
परंतु दिमाग में एक तूफान उठ रहा था—
जिसका शोर सिर्फ वे ही सुन सकते थे।
और तभी…
जीवन के पुराने घावों की परतें ऐसी खुलने लगीं जैसे हवा ने किसी पुराने दीवार के कोने से जमी धूल उड़ा दी हो।
उनका अतीत—
वही अतीत जिसकी जड़े अभी भी उनके भीतर कहीं गहरी दबी थीं, सामने तैरने लगा।
उन्हें याद आया—
एक ऐसा घर, जिसकी कोई चौखट नहीं थी…
जिसकी छत फूंस की थी…
और जिसका आंगन बारिश में तिरपाल से ढका होता था।
बरसात शुरू होते ही छप्पर से पानी की धार ऐसे गिरती थी, मानो कोई चैनल चालू कर दिया हो।
घर में फव्वारे लगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी—
कुदरत खुद लगाती थी।
ठंड के मौसम में हाल इससे भी बुरा होता था।
रजाई?
कहाँ!
पुआल ही काफी था…
और वही पुआल कई बार ठंड से लड़ने का हथियार बनकर उनके बचपन को बचाता था।
उन मिट्टी की दीवारों पर लड़का सत्यार्थ अपने सपने लिखता था—
एक दिन ज़िंदगी बदलेगी…
एक दिन वो भी ऊँची दुनिया में जाएगा।
और सचमुच वो गया।
आज जिस बंगले के सामने वह खड़ा था,
जिस बगीचे में हवा और धूप उसके स्वागत में प्रतीत हो रही थी,
जिस दुनिया में लोग उसे ‘प्रिंसिपल साहब’ कहकर सम्मान देते थे—
वह सब किसी की दया या खैरात नहीं थी।
वह संघर्षों का परिणाम थी।
दिन-रात की मेहनत…
हजारों तिकड़म…
कई बार की अपमान की चोट…
और अनगिनत बार की हार और फिर उठ खड़े होने का साहस।
सत्यार्थ बाबू का सीना कुछ पल को फूला,
पर अगली ही सांस में सिकुड़ भी गया—
क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि आज भी वे किसी मकड़ी की तरह अपने ही बनाए शानदार जाल में फंसे पड़े हैं।
आज़ादी…
चयन…
स्वतंत्रता…
ये सब शब्द जैसे उनके जीवन से धीरे-धीरे कटते जा रहे हों।
उन्होंने आसमान की ओर देखा।
नीले आसमान में एक सफेद बादल बह रहा था—
बिल्कुल उनकी जिंदगी की तरह—
चल तो रहा है,
पर दिशा अपनी नहीं, हवा की है।
पैसा बहुत कमाया…
कम नहीं, बहुत कमाया—
लेकिन सुख?
सुकून?
शकुन?
इनका स्वाद आज तक नहीं चखा।
सत्यार्थ बाबू ने धीरे-धीरे कुर्सी पर बैठते हुए गहरी साँस भरी।
कमला देवी का कहा गया एक छोटा-सा वाक्य भी उन्हें याद दिला गया था कि
मंज़िल मिलने से आदमी स्वतंत्र नहीं होता।
कई बार मंज़िल पर पहुँचकर बंधन और बढ़ जाते हैं।
उन्होंने आँखें बंद कीं।
अतीत उनके सामने बैठ गया।
वर्तमान उन्हें पकड़कर झकझोर रहा था।
और भविष्य…
वो किसी कोने में बैठा चुपचाप उन्हें देख रहा था।
धूप अब थोड़ा और तेज हो चुकी थी।
हवा भी भारी लगने लगी थी।
लेकिन मन में एक ही सवाल बार-बार घूम रहा था—
“क्या सचमुच मैं वहाँ पहुँच गया हूँ, जहाँ पहुंचना चाहता था?”

