उदास लम्हें
उदास लम्हें
¶¶¶ इमारत की तीसरी मंज़िल पर बने उस विशाल हॉल में रोशनी ऐसी थी मानो पूरा चाँद अपनी चांदनी वहीं उड़ेल कर चला गया हो। झूमरों की चमक, कोनों में रखे क्रिस्टल लैंपों की मृदु रोशनी और दीवारों पर टंगे सुनहरे फ़्रेम—सब मिलकर वातावरण को किसी राजमहल जैसा बना रहे थे। मंटो जैसे सामान्य परिवार में पले लड़के के लिए यह सब किसी सपने जैसा था। अनन्या… या यूँ कहें सौम्या… उस पार्टी की धड़कन थी। लेकिन यह बात मंटो को कुछ देर बाद ही समझ आई। --- चुन्नी दीदी ने उसके कान में धीरे से बोली थी , “क्या सोच रहे हो? दोनों एक ही लड़की के नाम हैं।” मंटो मुस्करा दिया—कड़वी, खुद-पर-हँसी वाली मुस्कान। “मेरी बहुत गलत आदत है, लेकिन क्या करूँ?” चुन्नी दीदी हँसी दबाते हुए बोली, “ड्राइवर हो… कोई जासूस नहीं।” लेकिन मंटो के मन में उसी क्षण एक झुनझुनी-सी उठी—क्या सच में वह सिर्फ ड्राइवर है? उसे लग ही नहीं रहा था। उस माहौल में, उस भीड़ में, वह किसी अदृश्य कहानी का हिस्सा बन चुका था। --- हॉल में कुर्सियाँ अब लगभग भर चुकी थीं। कमला देवी और प्रिंसिपल साहब, चुन्नी दीदी, उनके रिश्तेदार—सभी अपनी जगह पर बैठ चुके थे। शहर के बड़े कारोबारियों से लेकर नेताओं तक, डॉक्टरों से लेकर कॉलेज के प्रोफेसरों तक… हर कोई मौजूद था। मंटो ने अपनी आँखों से कमरे को कई बार नापा— “लोग पैसों के साथ-साथ शोहरत का भी कितना जलवा दिखाते हैं…” उसने मन में कहा। वह ऐसे आयोजनों में कभी नहीं आया था। उसकी ज़िन्दगी गाड़ी, किराया, सड़क और पेट्रोल के इर्द-गिर्द घूमती थी। लेकिन आज वह एक नई दुनिया देख रहा था—ऐसी दुनिया, जहाँ मुस्कुराहटें भी कीमत लेकर आती हैं। --- उसी समय… अचानक जैसे हवा थम गई। लोगों की नज़रें एक दिशा में टिक गईं। हॉल के प्रवेश द्वार पर सौम्या प्रकट हुई। सफेद गाउन में वह सचमुच परिजात की परी जैसी लग रही थी। उसकी चमकती आँखें, ऊँची नाक, सलीके से सेट किए गए बाल… और उसके भीतर की वह झिझक जो उसके चाल में दबी-सुनी हुई थी। अपने साँवले रंग को छिपाने के लिए उसने मेकअप का सहारा लिया था, यह बात साफ झलक रही थी। लेकिन उसके व्यक्तित्व में वह आकर्षण था, जो किसी भी खूबसूरत सजावट से ऊपर था। चुन्नी दीदी ने धीरे से मंटो के कान में कहा, “नागिन… पता नहीं आज किसे डसेगी!” मंटो धीरे से मुस्करा दिया, “आपकी सहेली है न?” “सहेली है तो क्या हुआ…” चुन्नी दीदी ने भौंहें उचकाईं, “आज मैं इसके घर आई हूँ, कल यह मेरे घर आएगी। लेकिन इसकी असली कहानी जानोगे तो हील जाओगे।” मंटो जानता था—चुन्नी दीदी की ये आदत है। ऊपर से मिठास, अंदर से तीखी टिप्पणी। वह हर किसी से घुल-मिल जाती हैं लेकिन किसी को अपने बराबर देखने की क्षमता उनमें थी ही नहीं। --- तभी तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। सौम्या और उसकी सहेलियाँ मंच की ओर बढ़ रही थीं। चुन्नी दीदी के मन में खटक रहा था— “एक साधारण व्यवसायी की बेटी को इतना सम्मान?” पर मंटो ने उस सवाल पर ध्यान ही नहीं दिया। उसकी निगाह तो सौम्या के ठीक पीछे खड़ी उस लड़की पर टिक गई थी— एकदम अमिता जैसी। चेहरा, आँखें, मुस्कान… सब वही। मंटो की साँस अटक गई। “ये… अमिता?” लेकिन पलभर में उसे सच्चाई पता चली— वो अमिता नहीं, बल्कि देव ओबराय की बहन खुशबू ओबराय थी। देव ओबराय… शहर का सबसे बड़ा नाम। कम उम्र में वह सफलता के उस मुकाम पर पहुँच गया था, जहाँ पहुँचने में लोगों की उम्र बीत जाती है। उसका परिवार हमेशा चर्चा में रहता था—पैसा, रुतबा, पावर… सब कुछ उनमें कूट-कूट कर भरा था। खुशबू ओबराय का होना ही इस पार्टी की असली वजह था। सौम्या की सहेलियों में वह सबसे प्रभावशाली थी, और शायद उसी के कारण यह आयोजन इतना भव्य बना था। --- सौम्या मंच के पास गई। सामने बड़ा-सा केक था, जिस पर ‘20’ की मोमबत्ती जल रही थी। उस मोमबत्ती की लौ जैसे सौम्या के चेहरे को और भी चमका रही थी। हॉल में अचानक खामोशी छा गई— हर कोई इंतजार कर रहा था कि सौम्या मोमबत्ती फूँक कर उस रात का असली जश्न शुरू करे। मंटो ने तीसरी बार अपनी सीट पर खुद को समेटा। उसे लगा—यह पार्टी सिर्फ जन्मदिन नहीं है। यह किसी नई कहानी का उद्घाटन है… और वह कहानी जल्द ही मंटो को अपनी गिरफ्त में लेने वाली है। (जारी)
