रात की श्याह छाया
रात की श्याह छाया
इंस्पेक्टर आदित्य सिंह की आँखों में थकान की गहरी रेखाएँ उभर आई थीं। दिन भर की भाग-दौड़, पूछताछ, फोन कॉल, रिपोर्ट और तनाव के बाद उनकी देह जैसे अपना हिसाब माँगने लगी थी। शाम कब ढली और रात कब उतर आई—उसे ठीक से याद भी नहीं। बस इतना महसूस हो रहा था कि सिर के भीतर हल्का-हल्का दबाव है, जैसे कोई अदृश्य हथौड़ा धीरे-धीरे चोट कर रहा हो। वह कुर्सी से उठे और कुछ क्षण के लिए टेबल पर रखी फाइलों को यूँ ही देखते रहे। फिर गहरी साँस लेकर बाहर बरामदे में आ खड़े हुए। पुलिस स्टेशन के बाहर सड़क पर हल्की-हल्की रोशनी फैली हुई थी। पीले बल्बों की रोशनी में धूल तैरती हुई दिखाई दे रही थी। पेट्रोलिंग गाड़ी अभी कुछ देर पहले ही निकली थी—उसकी सायरन की आवाज़ अब दूर कहीं धुंधली पड़ चुकी थी। एक संतरी छत पर अपनी ड्यूटी में लगा हुआ था। हाथ में राइफल, आँखें चौकन्नी, लेकिन चेहरे पर वही रात की ऊब। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी। बसुंधरा सिंह भी अपने क्वार्टर में जा चुकी थी। दिन भर की थकान उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी; शायद इस वक्त वह भी अपने बिस्तर पर चुपचाप लेटी दिन की घटनाओं को दोहरा रही होगी। आसमान अजीब तरह से शांत था। बादल दिखाई नहीं दे रहे थे, लेकिन हवा की रफ्तार ऐसी थी कि लगता था जैसे कहीं दूर कोई अदृश्य हलचल चल रही हो। वह हवा सीधी चेहरे से टकराती और भीतर तक सिहरन भर देती। ठंडी रात में पुलिस स्टेशन के बरामदे में खड़े आदित्य सिंह सोच रहे थे—क्वार्टर में जाऊँ… या यहीं बैरक में रात बिता दूँ? बैरक में रुकना आसान था। एक चारपाई, एक कंबल, और वही सरकारी सन्नाटा। लेकिन आज उनका मन वहाँ रुकने का नहीं था। बैरक में रात बिताने का मतलब होता—फिर वही आधी रात में फोन की घंटी, वही अचानक की हलचल, वही अनजानी बेचैनी। दिन भर की माथा-पच्ची के बाद हर इंसान शांति चाहता है। और आदित्य भी शांति की तलाश में था। उसने बरामदे की रेलिंग पर हाथ टिकाकर एक बार फिर बाहर की सड़क को देखा। मन में मयंक की लाश का दृश्य कौंध गया। बैजू अग्रवाल का पत्थर-सा चेहरा… और शिवानी के सवाल। “गला घोंटा गया…” डॉक्टर के शब्द उसके कानों में फिर से गूँज उठे। किसने? क्यों? और उस जली हुई कार का इससे क्या संबंध? सवाल हवा की तरह थे—दिखाई नहीं देते, पर भीतर तक हिला देते हैं। अचानक उसे लगा कि यहाँ खड़े-खड़े वह और भारी हो जाएगा। उसे चलना चाहिए। हवा को चीरते हुए, शोर को पीछे छोड़ते हुए। अतः उसने धीरे से बरामदे से नीचे कदम रखा। जूते की आवाज़ सीमेंट पर हल्की-सी गूँजी। फिर वह अपनी पसंदीदा बाइक—रॉयल एनफील्ड क्लासिक—की ओर बढ़ चला। बाइक हमेशा की तरह शांत खड़ी थी, लेकिन उसमें एक अलग ही आत्मविश्वास था। आदित्य ने हैंडल पर हाथ फेरा, जैसे किसी पुराने दोस्त का कंधा थपथपा रहा हो। चाबी घुमाई। अगले ही पल इंजन ने गहरी, भारी आवाज़ में गर्जना की—“ठक… ठक… ठक…” वह आवाज़ आदित्य को हमेशा सुकून देती थी। जैसे भीतर का तनाव इंजन की कंपन में उतर जाता हो। उसने हेलमेट पहना, एक बार पीछे मुड़कर थाने की इमारत को देखा। फिर क्लच दबाया… गियर डाला… और बाइक धीरे-धीरे आगे बढ़ चली। सड़क पर हल्की रोशनी थी। हवा अब तेज़ हो चली थी। बाइक की हेडलाइट सामने की सड़क को चीरती हुई रास्ता बना रही थी। हर मोड़ पर उसे आज की घटनाएँ याद आ रही थीं। भूमिया बावड़ी… झाड़ियों में फँसी लाश… बैजू अग्रवाल की खामोशी… और शिवानी की आँखों में उभरता अनकहा डर। बाइक की रफ्तार बढ़ती गई। रात और गहरी होती गई। लेकिन आदित्य के भीतर जो हलचल थी, वह शांत नहीं हो रही थी। क्वार्टर तक पहुँचने का रास्ता ज्यादा लंबा नहीं था, फिर भी आज उसे हर किलोमीटर भारी लग रहा था। जैसे सड़क सिर्फ दूरी नहीं, बल्कि सोच का बोझ भी नाप रही हो। उसने एक मोड़ काटा। हवा और तेज़ हो गई। पेड़ों की शाखाएँ हिलने लगीं। और उसी क्षण— उसे अनायास लगा कि यह रात सामान्य नहीं है। कुछ है… जो अभी सामने नहीं आया है। बाइक अपनी रफ्तार में आगे बढ़ती रही। और इंस्पेक्टर आदित्य सिंह… उस रात सिर्फ अपने क्वार्टर की ओर नहीं जा रहा था— वह अनजाने में किसी नए मोड़ की ओर बढ़ रहा था।


