सुबह का भूला
सुबह का भूला
रिश्ते जब बोझ लगने लगे तो, क्या करना चाहिए। कुछ समझ में नहीं आ रहा था।....इस रिश्ते को ढोते - ढोते, थक सी गई थी रंभा। भद्दी - भद्दी गाली गलौज। तीर की तरह कलेजे पर लगता। बिल्कुल असहनीय हो जाता।...जीवन बोझ की तरह हो गया था। कई बार वो सोचती मायके चली जाए । देहरी से पैर बाहर भी निकाल चुकी थी। लेकिन अगले ही पल ख्याल आता ,मायके में वो अब मेहमान हीं है।..मायके सही मायने में भाई भौजाई का घर है। जीवन बहुत ही लंबा है। मायके में नहीं कट पाएगा।...अपने इस घर की तो वो मालकिन है । यह सोचकर , वह अपना पैर देहरी के अंदर खींच लेती।...और बैठकर खूब रोती।...
रात के 2 बज गए थे। रंभा को नींद नहीं आ रही थी..पुनीत अब तक घर नहीं आया था । गुस्से में रंभा खुद से बोली, "भाड़ में जाए..आए या ना आए..मुझसे क्या मतलब। ..शराब पीकर कहीं गिरा होगा।....अगले ही पल वो उदास हो गई..दिल की धड़कन तेज हो गई.. आखिर पुनीत कहां रह गया होगा।...रोज तो अबतक आ जाता है। पुनीत जो भी है, जैसा भी है, अच्छा नहीं है, बुरा ही है...लेकिन उसका है ।...उसपर उसका पूरा अधिकार है ।...वो शराबी है । समय बदलते रहता है, एक दिन ऐसा भी समय आएगा। वो एक भद्र पुरुष बन जाएगा।....वो टॉर्च लेती है , और रात के सुनसान इलाके में अपने शराबी पति को ढूंढने निकल जाती है। सुनसान रोड पर कुत्ते की भौकने की आवाज । डर के मारे रंभा का हाथ - पांव फूल रहा था । फिर भी वो आगे बढ़ रही थी , और टार्च की रोशनी फेंक -फेंककर, इधर - उधर अपने पति को देखती।....घंटों बीत गए , लेकिन कुछ भी पता नहीं चला। तभी रंभा के दिमाग में आया। क्यों न हम शराब भट्टी की ओर देखे । वहीं पीकर पुनीत लुढ़का होगा । वो अपने कदम तेज कर दी और शराब भट्टी के पास पहुंच गई।...एक अजीब तरह की दुर्गंध आ रही थी । रंभा अपने नाक पर हाथ रखी । तभी उसकी नज़र बगल के नाले पर पड़ी। नाले के भीतर मुंह के बल , आधा लटका एक व्यक्ति कराह रहा था। रंभा उसी की तरफ बढ़ी। उस व्यक्ति को एक हाथ से खींचकर बाहर निकाली । और रोड पर ही पीठ के बल लिटाई। उस व्यक्ति का चेहरा देखकर। इसके मुंह से चीख निकल गई।.........."अरे ! ये तो पुनीत है।"
उसका चेहरे पर चोट के निशान थे। खून का स्राव हो रहा था। वो काफी मशक्कत करते हुए, पुनीत को घर लाई। गर्म पानी करके कपड़े से सारे शरीर को पोंछी, उसके कपड़े बदली ,घाव पर मरहम लगाई। और बेड पर सुला दी। रंभा थककर चूर हो गई थी । वो घड़ी पर नजर दौड़ाई। रात को तीन बज रहे थे। सारे शरीर में दर्द का अनुभव हो रहा था । वो पुनीत के बगल में ही लेट गई।
रंभा को कोई झझोड़ा, रंभा अचकचा कर जागी। रंभा आंख खोली। देखी ,पुनीत सामने खड़ा था। उसके हाथ में चाय का प्याला था। रंभा को आश्चर्य का ठिकाना न रहा, वो शादी के बाद, अब तक कभी ऐसा दृश्य नहीं देखी थी।...रंभा चाय का प्याला हाथ में पकड़ते हुए पुनीत के आंखों में देखा। उसके आंखों में संकोच और पश्चाताप स्पष्ट दिख रहा था। पुनीत कुछ बोलने के लिए मुंह खोला, रंभा पुनीत के मुंह पर हाथ रख दी । पुनीत के आंख से आंसू आ गए। रंभा पुनीत के आंखों के आंसू को पोंछते हुए बोली, "पश्चाताप के आंसू से सारी कमियां धूल जाती है । कुछ कहने की जरूरत नहीं है । शब्द शून्यता भी सबकुछ बोल देती है, बस समझने के लिए परख होनी चाहिए।...सुबह का भूला शाम को घर आ जाए, उसे भुला नहीं कहते।"
रंभा की बात सुनकर, पुनीत हल्की सी चेहरे पर मुस्कान लाते हुए बोला, "सिर्फ सॉरी तो बोल सकता हूं।"
"नहीं , हम दोनों के बीच सॉरी की अब कोई गुंजाइश नहीं है।" रंभा भी मुस्कुराते हुए बोली।
दोनों एक दूसरे से लिपट गए।

