Dr Jogender Singh(jogi)

Abstract


4.5  

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सत्संग

सत्संग

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“ मैंने भी एक दिन एक पैग पीया , अपनी सोसायटी में तमाम परिवारों की औरतें पीती हैं । तुम को तो जैसे पता ही नहीं , इतने भी भोले मत बनो।"कविता अपनी आँखें मटका कर ज़ोर से हँसी । 

"सही में मुझे नहीं पता । तुमने कहाँ पी , रेड वाइन होगी ?" विवेक ने उत्सुकता से पूछा ।

"अरे नहीं , रेड वाइन नहीं पीती मैं , सिर्फ़ बीयर या फिर व्हिस्की और सुनो !! उस दिन मैं पूरे मूड में आ गयी थी । अगर फ़ोन उठा लेते सब हो जाता उस दिन । पर तुम फ़ोन ही नहीं उठाये ।" 

“ मीटिंग थी , बहुत ज़रूरी । फ़ोन उठा भी लेता , तो आ थोड़ी पाता । विवेक को कविता से डर लगने लगा ।“ कैसी औरत है ? मन ही मन विवेक ने सोचा । 

"तुम्हें डर नहीं लगता , अपने पति से ?" विवेक ने पार्क के पार देखते हुए पूछा ।

"उनको सत्संग से फुर्सत हो तब ना , जब से शादी हुई तब से सत्संग सत्संग की रट लगाये हुए हैं । शादी क्या सत्संग करने को की ।" कविता फिर हँसी ।

एक महीने पहले कविता और उसके पति अनिल से विवेक की मुलाक़ात सत्संग में हुई । अनिल बहुत शांत स्वभाव के मिलनसार व्यक्ति ।विवेक को पहली मुलाक़ात में ही अनिल अच्छे लगे ।कविता से भी अभिवादन हुआ । बातों बातों में पता चला अनिल और कविता उसी की सोसाइटी में रहते हैं ।

"मूल निवास कहाँ का है " अनिल ने पूछा ।

"सुल्तानपुर ।" 

"तब तो हमारी ससुराल पक्ष के हो , बढ़िया ! कभी घर आओ । कब से रह रहे हो मधुर मिलन में ?" 

"अभी एक महीने पहले आया हूँ , एन॰ टी॰ पी॰ सी॰ में काम करता हूँ । इस से पहले उचाहार में था । कुल एक साल की नौकरी है ।" विवेक ने जल्दी से बताया ।

अनिल धीमे से मुस्कुराया , "तुम्हें सत्संग की बहुत ज़रूरत है । आराम से बात किया करो । "

"मेरी मम्मी भी यही कहती है ,इसीलिए सत्संग के लिये आया हूँ ।" विवेक झेंप गया ।

"सही कहती है तुम्हारी मम्मी" , अनिल ने गम्भीरता से बोला "पहले कविता भी सत्संग नहीं आती थी , अब देखो इसको सत्संग किए बग़ैर चैन ही नहीं आता । क्यों कविता ?" 

"जी हाँ" , कविता चौंक कर बोली । 

उस दिन से कविता जहाँ भी विवेक को देखती , मस्ती करने लगती । विवेक भी धीरे से मज़ाक़ करने लगा । पता ही नहीं चला कब दोनों इतने क़रीब आ गए ।दोनो एक दूसरे से वट्सऐप पर देर रात तक चैट करने लगे ।एक दूसरे के बारे में जानते जानते बहुत क़रीब आ गए । कविता के अनुसार अनिल को न तो सेक्स करने में विश्वास था न ही कोई और मौज मस्ती । अनिल का मन रखने के लिए कविता सत्संग भी जाती , पर अपने शरीर की अधूरी प्यास मिटाने के लिए विवेक के रूप में एक मौक़ा मिल गया । 

अंतरंगी बातें करते करते , कभी कभी अपनी जिस्म दिखाती तस्वीरें भी कविता विवेक को भेजने लगी ।विवेक भी कविता का साथ पाकर खुश था । पर उसकी शराब पीने की बात सुन कर , विवेक अनमना सा हो गया ।

"क्या हुआ ? एकदम ऑफ़ हो गये तुम ।" कविता ने विवेक की आँखों में झांका ।

"कुछ नहीं !" यूँ ही । 

"एकदम से उदास हो गये , क्या अपनी किसी दोस्त की याद आ गई ?" कविता ने चुटकी ली ।

"एक बात बोलूँ ।" विवेक दूसरी तरफ़ देखते हुए बोला "मुझे तुम्हारी शराब पीने वाली बात अच्छी नहीं लगी ।"

"अरे भई , मैं कौन सा रोज़ पीती हूँ । कभी कभार पी लेती हूँ । क्या तुमने कभी नहीं पी ? "

"मुझे नफ़रत है , शराब के नाम से , प्लीज़ तुम भी मत पिया करो " विवेक ने बड़ी उम्मीद से कविता की तरफ़ देखा ।

"तुम सारे मर्द एक जैसे ही हो, अनिल इतने सालों से अपनी चलाते रहे , उनके साथ घुटती रही , अब तुम भी वही कर रहे हो ।" कविता का चेहरा लाल पड़ गया । 

"सॉरी , मेरा यह मतलब नहीं था । बस तुम शराब मत पिया करो ।" विवेक हक़ से बोला ।

"क्यों मैंने तुमसे कभी कहा कि तुम पिया करो , नहीं ना ! फिर तुम क्यों क़ब्ज़ा करना चाहते हो मुझ पर ।" कविता ग़ुस्से से बोली ।

"यह बात नहीं है , पर शराब पीना ग़लत है ।" विवेक हथियार डालते हुए बोला "प्लीज़ ग़ुस्सा मत हो ।"

"देखो , यह फ़र्ज़ी संत किसी और के सामने बनना । जब मुझ से अश्लील बातें करते हो वट्सऐप पर वो भी घंटों तक , तब कहाँ मर जाता है तुम्हारे अंदर का संत महात्मा । तब तो मेरी नंगी तस्वीरों में तुम्हें देवी नज़र आती होगी । सभी कुत्ते की तरह हो तुम सब । जाओ जा कर किसी महान आत्मा वाली औरत को अपनी दोस्त बनाओ" कविता ने खा जाने वाली नज़रों से विवेक को घूरा ।

"सॉरी , सॉरी , मेरा वो मतलब नहीं था, बस तुम्हारी सेहत का ख़्याल करके बोला था" विवेक ने बात सम्भालने की कोशिश की ।

"रहने दो विवेक, मैं कोई दूध पीती बच्ची नहीं । बस एक मेहरबानी करना आज के बाद मुझ से कोई सम्बंध नहीं रखना , वर्ना सब के सामने तुम्हारे झूठे संतपने की पोल खोल दूँगी ।आ थू , तुम्हारे ऊपर " कविता धड़धड़ाती हुई चली गयी ।

"विवेक सुनो , सुनो" चिल्लाता रह गया । विवेक ने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई , अच्छा है कोई आस पास नहीं है । उसने चैन की साँस ली ।कल से सत्संग में दिल से मन लगा कर बैठूँगा । विवेक सोच कर मुस्कुरा दिया ।



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